मैं खिलता हूँ, क्योंकि खिलना मुझे सुहाता है
दोस्तों क्या आप जानते हैं एक फूल रोज सुबह खिलता है और शाम तक मुरझा जाता है लेकिन इस बीच वह कितनों को आनंदित कर जाता है। सबसे पहले तो उस माली से पूछिए जो उस पौधे को रोज खाद पानी देकर उसे सहेजता है, सुबह सुबह खिले हुए फूल को देखकर वह कितना खुश होता होगा। एक खूबसूरत प्यारी सी रंगबिरंगी पंखों वाली तितली आई थोड़ी देर तक फूल पर बैठकर मकरंद लेकर झूमती नाचती चली गई किसी और फूल के पास। कहीं से झूमता गाता और अपनी धुन में गाना गाता आवाज निकालता भौंरा आया फूलों की खुशबू ने उसे अपनी ओर खींच लिया वह मदमस्त होकर नाचने लगा और फिर झूमते हुए हवा के दिशा में तैर गया। पंचद्रव्य में से एक कहे जाने वाले शहद की खोज और लालच में मधुमखियां भी फूल पर मंडराने लगती है, सोचती है क्या मैं इस फूल का रस एकत्रित कर सकती हूँ ? फूल समझ जाता है और अपने को पल्लवित कर उसे प्यार से आमंत्रित कर लेता है,जी भरकर रसास्वादन करने के पश्चात मधुमक्खी उड़ जाती है हम सबके लिए अनमोल उपहार तैयार करने के लिए क्योंकि मधुमक्खी जानती है मेरे द्वारा तैयार शहद मानव के लिए अमृत से कम नहीं है।
एक नन्हा सा बालक खेलते हुए फूल के समीप आया । फूल को देखकर उसके चेहरे की रौनक बढ़ गई। उसे अपलक निहारता रहा और सोचता रहा इतने खूबसूरत और रंग बिरंगे फूल आखिर ईश्वर(प्रकृति) ने कैसे बना डाले, वह मन ही मन अपने प्रश्नों के उत्तर खोजता रहता है।
सुबह की सैर करने वालों ने तो फूलों को अपनी जागीर समझ रखा है कहीं भी,कैसे भी स्थिति में खिला रहे वो उसे तोड़ने में ही अपनी मर्दानगी समझते हैं चाहे इसके लिए उन्हें कुछ भी करना पड़े।
प्लास्टिक की पन्नी में ,कपड़े की झोली में पड़े पड़े एक दिन फूल ने इंसान से धीरे से पूछा कि आखिर आप सुबह सुबह इतनी बेदर्दी से मुझे क्यों तोड़ते हो,अभी तो मुझे बहुत से लोगों से मिलना था उनसे बातें करना था उनके दुख और सुख को बांटना था लोगों को खुशी पहुँचाने के लिए ही तो मैं रोज खिलता हूँ जिसे आपने बड़े बेदर्दी से तोड़ लिया आखिर क्यों? तोड़ने वाला मुस्कुराकर कहता है अरे तुम व्यर्थ में काहे परेशान होते हो तुम पेड़ में रहते तो क्या ईश्वर से मिल पाते मैं तुम्हें अपने आराध्य देवों के शीश पर चढ़ाऊँगा ये तो तुम्हारा सौभाग्य है।फूल कहता है अरे निर्बुद्धि मैं ही तो प्रकृति हूँ और मैं ही तो ईश्वर हूँ तू मुझे सहेज तेरा आराध्य तेरे से ऐसे ही प्रसन्न हो जाएगा। मानव कहता है कि मैं तुझे लड़ियों में पिरोकर अपने प्रियतमा के बालों में लगाकर उसे खुश कर दूँगा फूल हंसकर कहता है किसी दिन उनको मेरे पास ले आना देखना मुझे देखकर वह कितना आनंदित होगी ,मुझे उसके केशों में नहीं अपने जड़ और पौधे में ही रहना अच्छा लगता है। जानते हो किसी बीमार आदमी के कमरे में मुझे गमले सहित रख दो उसकी बीमारी मैं ठीक कर दूंगा,वो व्यक्ति तो मुझे देखकर ही हर्षित हो अपने रोग व्याधि को भूल जाएगा।कुछ पल के लिए ही सही मैं कितनों को सुख देके खुश रहता हूँ। मैं तो आज में जीता हूँ कल की चिंता क्यूँ करूँ,इसलिए तो मैं रोज खिलता हूँ क्योंकि खिलना मुझे सुहाता है।
साथियों क्या हम एक पुष्प की तरह अपनी जिंदगी नहीं जी सकते जिसका हर पल औरों को खुशियाँ देने में बीतता है। अपने लिए तो हर कोई जीता हैं जो दूसरों के लिए जिये उसी को जीना कहा जाएगा। इसी मिट्टी ने हमें और पौधों दोनों को जीवन दिया,पाला पोसा सिंचित किया हमारी जड़ों को बांधके रखा तो फिर हम क्यों न इस मिट्टी के कुछ कर्ज को उतारकर जियें।
आखिर इस मिट्टी ने ही हमें रूप रंग नाम और शोहरत दिया तो हमें भी अपने इसी जीवन में ही मिट्टी के इन सारे उपकारों को याद कर, औरों को भी खुशियां प्रदान करने की कोशिश करनी चाहिए। जीना तो उसी का जीना है जो औरों के काम आए।फूल कहता है मेरा क्या शाम को मुरझाकर मै झड़ जाऊंगा कल सुबह फिर नई ऊर्जा और ताजगी से फिर से खिलूँगा क्योंकि मैं खिलता हूँ और खिलना मेरी फितरत है।।
रामेश्वर गुप्ता, बिलासपुर
1 मई,2021
