कहानी

*मतलबी इंसान*

वकील साहब ट्रक को साइड देते – देते कुम्हारी नाला में गिर गये। पत्नी तारिणी चिल्लाई मर गई… मर गई….! फिर बेहोश हो गई । कुछ देर पश्चात जब होश में आई तो उनका पति रामगोपाल भी कराह रहे थे । उनके हाथ- पैर में गहरी चोटें लगी हुई थीं। दोनों एक दूसरे को देख – देखकर विलाप कर रहे थे। मर गया… मर गया… बचाओ… बचाओ…! परंतु पुल के नीचे पड़े रहने के कारण मानो वे शून्याकाश में गुहार लगा रहे थे।उन्हें कोई देख नहीं पा रहे थे न ही उनकी आवाजें सुन पा रहे थे।
तारणी बोली-” मोबाइल से किसी को बुला लो!”
रामगोपाल जेब से मोबाइल निकाला और 987… नंबर पर उंगली दबाया । फिर ध्यान आया बेटे के साथ करीब साल भर से बातें नहीं हो रही है। एक साथ रहते हुए भी हम लोग कोसों दूर हैं उनके साथ तो ‘मिलना नामंजूर तो चौखट बड़ी दूर’ वाली बात है । वह तो मेरे पैसे के पीछे दीवाना है। कहीं उससे मदद लूं तो फिर पैसा मांगेंगा अगले महीने रिटायर होने वाला हूं ।सारे पैसे वही ले लेगा, ऐसा सोचकर वकील साहब मोबाइल से उंगली हटा दिए । भाई को बुला लेता हूं । एक- दो नंबर लगा पाये थे । याद आया उसके साथ दो सालों से मुकदमा चल रहा है। उनके सामने में झुकूं…! कदापि नहीं… । भले जो भी हो जाए। मोबाइल स्क्रीन में बहन का नंबर निकाला फिर सोचने लगा वह तो बिचारी हर बार मुझे राखी बांधने आती है पर मैंने कभी उनका सम्मान नहीं किया । कभी तीज त्योहार में उन्हें नहीं बुलाया ।अभी उनसे बात करूंगा तो मतलबी भाई समझा जाऊंगा। कुछ पल रुक कर सोचा मेरे मित्र के पास मोबाइल लगाता हूं नंबर निकलते ही रामगोपाल को तुरंत याद आया। एक महीने पहले मेरे मित्र रामदीन जबरदस्त बीमार पड़े थे, तब उन्होंने मुझसे सहायता मांगी थी। कुछ रुपए मांगे थे ,तब मैंने उसे साफ इनकार कर दिया था कि मेरे पास रुपये नहीं है। यहां तक मैं उन्हें देखने नहीं गया ना ही फोन से उसकी सुधी ली।
” तारिणी कराहती हुई बोली-“क्या हुआ जी! क्या सोच रहे हैं? क्या किसी का मोबाइल नहीं लगा?”
“मुझे किसी के पास मोबाइल लगाने की हिम्मत ही नहीं हो रही है।”
“क्यों?”
“रामगोपाल ने चुप्पी साध ली।”
” मैं समझ गई…!आप क्या फोन लगाएंगे ?आपका व्यवहार ही सही नहीं है। आप तो एक नंबर के मतलबी इंसान हैं। जब काम रहेगा तब बाप, भैया, मां – बहन कहकर उनके आगे हाथ जोड़ते हैं और समय में उन्हें देखना पसंद नहीं करते हैं। आप तो स्वार्थी हैं । स्वारथ लागि करे सब प्रीति यही प्रवृत्ति आपकी है। बंधु बांधव सब आपकी सहायता करते हैं । परंतु आप किसी की सहायता नहीं करते । इसीलिए आप सहायता लेने से घबरा रहे हैं।
” तुम सच कहती हो तारिणी !अब तुम ही तारो यहां से उबारो। कहते हुए वकील साहब फूट-फूटकर पड़े ।
सुरेश का मोबाइल लगते ही उनके बेटे उन्हें आकर ले गए। रामगोपाल को पश्चाताप हुआ कि वाकई मैं मतलबी व्यक्ति हूं। मुझे ऐसा नहीं होना चाहिए यथासंभव सबकी सेवा करनी चाहिए और सबके साथ मधुर बर्ताव करना चाहिए । मृदुवाणी सुंदर वर्ताव ,सभी गुणों की खान है । प्रेम की गंगा बहे जहां पर, वह घर स्वर्ग समान है।

लेखक
*दिनेंद्रदास*
कबीर आश्रम करही भदर,
अध्यक्ष मधुर साहित्य परिषद् ,जिला- बालोद (छत्तीसगढ़)
मो.85648 86665