प्रमोद दुबे
महासमुंद – स्थानीय शंकर नगर में वार्ड नंबर 1 कृपा डेयरी के पास चल रहे श्रीमद् भागवत कथा पुराण में व्यास पीठ से सुदामा चरित्र का बखान करते हुए पं. मिथिलेश तिवारी ने कहा कि सुदामा गरीब जरूर थे पर दरिद्र नहीं। वे तो प्रशांतात्मा और जितेंद्रय हैं जिन्होंने अपनी सभी इंद्रियों पर विजय प्राप्त कर ली हो वह दरिद्र नहीं हो सकता इसलिए उन्हें दरिद्र कहना गलत होगा। हर हाल में प्रसन्न रहने वाले सुदामा पूर्व जन्म में एक विप्र थे। जिन्होंने भगवान सतनारायण कथा श्रवण किया, जिसके कारण द्वापर युग में भगवान कृष्ण को मित्र के रूप में प्राप्त किया। पंडित जी ने सुदामा चरित्र का विस्तार से बखान करते हुए कहा कि ब्राह्मण को कभी भी भिक्षा नहीं मांगना चाहिए। भिक्षा मांगने से ब्राह्मणत्व नष्ट हो जाता है। पूजा पाठ से जो मिल जाता उसी से सुदामा का परिवार जीवन यापन करता था। गरीबी की दुर्दशा देखकर उसकी पत्नी सुशीला ने भगवान कृष्ण से मिलने की प्रेरणा दी और आसपास से पांच मुट्ठी चावल चिवड़ा मांग कर एक सिले हुए फटे कपड़े में पोटली बनाकर दे दिया। भ्रमण करते हुए जब सुदामा द्वारकाधीश की नगरी पहुंचे तो भगवान ने उन्हें बराबर का सम्मान देते हुए अपने सिंहासन पर बिठाया और द्वारकाधीश का पूरा परिवार चरण पखाकर चरणोंदक प्राप्त किया।

गुरुकुल में बिताए क्षणों को याद करते हुए दोनों मित्र ठिठली कर रहे थे। अचानक भगवान द्वारकाधीश ने पूछा कि भाभी ने मेरे लिए क्या भेजा है, इस पर सुदामा सकुचाते हुए पोटली कांख में दबा ली। लेकिन भगवान ने सुशीला के भेजे हुए पोटली प्राप्त कर समझ गए कि उनका मित्र की क्या दशा है और वे दो मुट्ठझे चावल स्वयं ग्रहण कर सुदामा को दो लोकों का वैभव दे दिया। लेकिन इसकी जानकारी सुदामा को नहीं होने दी। जब सुदामा घर पहुंचे तो वहां का वैभव देखकर आश्चर्यचकित रह गए। इसके पूर्व कथा प्रसंग में व्यास पीठ से श्री तिवारी जी ने भगवान द्वारकाधीश की 16108 विवाह, जरासंध उद्धार, प्रद्युम्न की कथा, अनिरुद्ध और बाणासुर की पुत्री उषा विवाह प्रसंग के दौरान भगवान श्री कृष्णा और शिव युद्ध का भी विस्तार से वर्णन किया।

