आंवला नवमीं पर्व धार्मिक आस्था के साथ पर्यावरण संरक्षण का संदेशः ज्योति किरण।

प्रमोद दुबे 

महासमुंद। छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचल में पेड़ पौधों, नदी तालाब व प्रकृति को पूजने की परंपरा सदियों से चली आ रही है।जानकारी देते हुए डॉ श्रीमती ज्योति किरण चंद्राकर ने बताया कि आंवला नवमी का त्योहार धार्मिक आस्था के साथ. साथ पर्यावरण संरक्षण और प्रकृति को सहेजने का संदेश देता है। आंवला नवमी का पर्व कार्तिक माह में शुक्ल पक्ष की नवमी को मनाया जाता है जो कि इस वर्ष 10 नवंबर को मनाया जाएगा।

यह पर्व समूह में मनाया जाता है, जो कि पारिवारिक व सामाजिक एकता का संदेश देता है। आंवला नवमी का पर्व शुक्ल पक्ष की नवमी को मनाया जाता है। इस दिन व्रत करने वाली महिलाएं आंवला पेड़ के नीचे एकत्रित होकर भोजन बनाती है और आंवला पेड़ के नीचे साफ-सफाई करके चांवल आटे से चौक बनाकर गौरी. गणेश कलश स्थापित कर फूल, गुलाल नैवेद्यं चंदन बेलपत्र नारियल अर्पित कर पेड़ की पूजा करतें हैं।

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ऐसा माना जाता है कि आंवला के पेड़ में शिवजी और विष्णु जी का वास होता है। पूजा करके 7 बार अथवा 108 बार पेड़ का परिक्रमा कर पीले धागे से लपेटा जाता है। श्रृंगार की सभी सामग्री, अन्न, फल व दैनिक उपयोग की चीज चढ़ाकर पूजा पश्चात ब्राह्मण को दान दिया जाता है। व्रत के संबंध में कथा सुनी जाती है। माना जाता है कि, इस दिन दान करने से अक्षय पुण्य प्राप्त होता है। और माता लक्ष्मी. विष्णुजी और शिवजी की पूजा करने पश्चात महिलाएं मिलकर वही पेड़ के नीचे भोजन पकाती है और भोजन करती हैं।

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हिंदू पुराणों के अनुसार यह माना जाता है कि आंवला नवमी के दिन माता लक्ष्मी भ्रमण के लिए निकली थीं तब उन्हें शिवजी और विष्णु जी की पूजा करने का विचार मन में आया तब उन्होंने आंवला पेड़ का चुनाव किया और वह दिन कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष का नवमी था। माता लक्ष्मीजी ने पूजा करने के उपरांत आंवला पेड़ के नीचे बैठकर भोजन ग्रहण की, उसी दिन से आंवला नवमी का व्रत किया जाने लगा। वर्तमान समय में आंवला नवमी का व्रत ग्रामीण अंचल में किया जाता है, शहरी परिवेश में कम लोग ही करते हैं। इस प्रकार यह व्रत पर्यावरण संरक्षण और प्रकृक्ति संरक्षण का संदेश देती हैं।