मानस जैसा ग्रंथ नहीं–
मानस जैसा ग्रंथ नहीं– —–०——०—-०—– तुलसीदास तेरी लेखनी,जग में है अनमोल| भव बंधन टूट जात है,सुन मानस के बोल|| लख चौरासी के फेर में,जीवरा भटका जाय| जो मानस,मानस रखे,जनम धन्य हो जाय|| सियाराम के दर्शन को, मन चंचल मचलाय| तुलसी मानस कल्पतरु,सब संभव हो जाय|| आप बना दो हे!प्रभु,मुझको भी तुलसीदास| जो तुलसी के संग…
