मानस जैसा ग्रंथ नहीं–

मानस जैसा ग्रंथ नहीं–
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तुलसीदास तेरी लेखनी,जग में है अनमोल|
भव बंधन टूट जात है,सुन मानस के बोल||

लख चौरासी के फेर में,जीवरा भटका जाय|
जो मानस,मानस रखे,जनम धन्य हो जाय||

सियाराम के दर्शन को, मन चंचल मचलाय|
तुलसी मानस कल्पतरु,सब संभव हो जाय||

आप बना दो हे!प्रभु,मुझको भी तुलसीदास|
जो तुलसी के संग रहे,श्रीरघुवर उसके पास||

सब संतन में श्रेष्ठ कहूं,गोस्वामी तुलसीदास|
धरती में मानस अरु,रवि चमके जो आकाश|

सप्तकांड मानस रचे,तुझ सा कवि न कोय|
मानस जैसा ग्रंथ नहीं,राम सा रवि न होय||

अंत काल कुछ ऐसा हो, हे!आंनद के धाम|
सन्मुख मानस ग्रंथ हो,मुख से निकले राम||

रचनाकार:-श्रवण कुमार साहू, “प्रखर”
शिक्षक/साहित्यकार, राजिम, (छ. ग.)/व्याख्याकार, तुलसी के राम मानस परिवार राजिम, जिला गरियाबंद, , संपर्क–9009540810
6264217702