लोक मंगल और जन-नायक संत कवि– गोस्वामी तुलसीदास जी

तुलसीदास जी जनमानस के कवि,लोकनायक कवि, समन्वयवादी कवि लोक मंगल के कवि,अर्थात सम्पूर्ण जीवन के सांगोपांग का चित्रण करने वाले कवि।धर्म,कला,संस्कृति,साहित्य,आस्था,विश्वास,भक्ति,मर्यादा, आदि की स्थापना करने वाले कवि गोस्वामी तुलसी दास जी का जन्म श्रावण मास के शुक्ल पक्ष सप्तमी तिथि को संवत 1589 सन 1532 राजापुर में हुआ।

यद्यपि कुछ विद्वान इनके जन्म को, संवत 1554 में स्थान सोरो को बताया है।

इनके पिता का नाम आत्माराम और माता का नाम हुलसी बाई था।और इनका विवाह रत्नावली से हुआ।

तुलसी दास जी की साहित्य साधना अद्भुत थी।उन्होंने साहित्य का सृजन करते हुए सभी क्षेत्रों में अपने लेखनी चलाई है।इनका क्षेत्र अत्यंत व्यापक है।उन्होंने मानव जीवन की स्मपूर्णता का विशेष वर्णन किया है।

तुलसीदास जी मर्यादा और लोकमंगल की भावना को ध्यान में रखकर साहित्य का सृजन किया है। उनके साहित्य में मानवीय गुणधर्म का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।जैसा कि उन्होंने कहा–

“सचिव वेद गुरु तीन जो

प्रिय बोलहिं भय आस।

राज धर्म तन तीनि कर

होहिं बेगिहीं नास ।।”

इसी प्रकार दुष्प्रवृतियाँ अर्थात काम,क्रोध,मद,लोभ,यह सभी मानव के पतन के द्वार हैं।इसीलिए तुलसीदास जी ने इनको नर्क का द्वार कहा।इससे बचने के लिए मानव को ईश्वर की शरण में जाने के लिए अगाह किया:–

“काम क्रोध मद लोभ सब,

नाथ नरक के पंथ।

सब परिहरि रघुवीरहिं,

भजहुँ भजहिं जेहि सन्त।।”

तुलसीदास जी की भक्ति भावना बड़ी निर्मल,थी।उनकी भक्ति में शक्ति थी।दृढ़ विश्वास था।और इसके लिए उन्होंने नवधा भक्ति की रचना कर डाली।

“नवधा भक्ति कहहूं तोहि पाहीं

सावधान सुनूं धरू मन माहीं।”

और इस प्रकार से भगवान श्री राम जी ने माता शबरी को नव प्रकार की भक्ति का रहस्य समझाया।जिसने पहिली–संतो की संगति,दूसरी–ईश्वर कथा में प्रेम,तीसरी–गुरु के चरणों की सेवा, चौथी–छल कपट त्यागकर ईश्वर के गुणों का गान,पांचवी–ईश्वर में दृढ़ आस्था रखकर मंत्र का जाप,छठवीं–इंद्रियों का वशीकरण,सातवीं–जीव जगत को समभाव में देखना,आठवीं–मन में संतोष,और नवीं–सरलता और सहजता थी।जिसको श्रवण करके माता शबरी धन्य हो गई।और मोक्ष प्राप्त कर लिया।

तुलसी दास जी की भावना लोक

कल्याणकारी रही है।इसीलिए वो कलयुग को ध्यान में रखते हुए लोक मंगल की बात करते हैं–

“मंगल करनि कलिमल हरनि।

तुलसी कथा रघुनाथ की।।

मंगल भवन अमंगल हारी।

द्रवहूं जो दसरथ अजिर बिहारी।।”

इसी प्रकार वो सेवा धर्म के संबंध में कहते हैं

जिसमें सेवा से बढ़कर धर्म नही और दुसरो को पीड़ा देने से बड़ा कोई अधर्म नही।

और वो आगे यह भी कहते हैं–

“सब नर करहिं परस्पर प्रीति।

चलहि स्वधर्म निरत श्रुति नीति।।”

तुलसी दास जी समन्वयवादी कवि माने जाते हैं।रामचारित मानस के प्रत्येक कांड मे वो समन्वय करते हुए दिखाया है।उन्होंने प्रेम सद्भभावना,मैत्री,भाईचारा,त्याग,मर्यादा का सुन्दर उदाहरण प्रस्तुत किया है।हनुमान जी के चरित्र में यही बात देखने को आती है।जिनके माध्यम से उन्होंने एक पात्र का दूसरे पात्र से मैत्री कराना और फिर उन दोनो के बिच प्रगाढ़ प्रेम संबंध स्थापित करना दिखाया है।

हनुमान जी द्वारा प्रभु श्री राम को सुग्रीव से मिलाना और फिर उनसे मित्रता कराना।ताकि माता सीता की खोजा जा सके-

“तेहि सन नाथ मयत्री कीजे

जानि तेहि अभय करिजे।

सो सीता खोज कराइहिं

जहं-तहं मरकट कोटि पठाइहिं।।”

इस प्रकार से यह कहा जा सकता है की तुलसीदास जी ने लोक–मंगल की भावना से साहित्य सृजन किया,जिसका उदाहरण उनका महाकाव्य रामचरित मानस है।जिसके प्रत्येक कांड में आम जन–मानस के कल्याण और समन्वय की बात कही है।साथ ही साथ इन्होंने हिंदी साहित्य को भी अमर बना दिया।जिनकी लेखनी से रस,छंद अलंकार,भाषा तो समृद्ध हुई ही।आम जनों के लिए भी सहज और सरल हो गई।तभी तो अयोध्या सिंह उपाध्याय जी ने सही कहा है–

“कविता करके तुलसी न लसै,

कविता लसी पा तुलसी की कला।”