शहीद वीर नारायण के बलिदान दिवस पर सभी वीर शहीदों को शत-शत नमन : भाजपा किसान नेता अशवंत तुषार साहू।

प्रमोद दुबे 

महासमुंद : सक्रिय सदस्य भाजपा किसान नेता अशवंत तुषार साहू शहीद वीर नारायण के बलिदान दिवस पर उन्हें याद करते हुए उसके जीवनी को बताया अंग्रेजों के छत्तीसगढ़ डिवीजन में रायपुर कमिश्नरी के अंतर्गत रायपुर और संबलपुर जिला थे । रायपुर जिला के अंतर्गत सोनाखान छोटी जमींदारी थी जो अब बलौदाबाजार जिला के अंतर्गत है और इसके जमींदार नारायण सिंह थे । नारायण सिंह का ससुराल महासमुंद जिला के सरायपाली की सीमा के निकट घेंस में था जिसके जमींदार माधो सिंह थे । जमींदार माधो सिंह की बेटी तुलसी नारायण सिंह की पत्नी थी । वर्तमान में घेंस कस्बा ओडिशा के बरगढ़ जिला में है । वर्तमान छत्तीसगढ़-ओडिशा का सीमांत क्षेत्र 1852 से अकाल ग्रस्त था और कंपनी सरकार टैक्स भी लगातार वृद्धि कर रही थी जिससे किसानों का जीवन निर्वाह दूभर हो गया था । जनता को भूखों से मरते देख देश भक्त जमींदार नारायण का हृदय कराह उठा और उसने अपनी जमींदारी के निकट देवरी के माखन बनिया से जनता के लिए उधार में अनाज मांगा लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली । हताश नारायण सिंह ने माखन बनिया का गोदाम जो अनाज से भरा हुआ था का ताला तोड़कर अनाज जनता में बंटवा दिया । इस घटना की शिकायत रायपुर के डिप्टी कमिश्नर इलियट से की गई और नारायण सिंह को 24 अक्टूबर 1856 को उनके ससुराल घेंस से गिरफ्तार कर लिया गया । घेंस के जमींदार संबलपुर के विद्रोही वीर सुरेन्द्र साय के निकट सहयोगी थे और संबलपुर राज्य के ब्रिटिश विरोधी जमींदारों को संगठित कर रहे थे । इस कार्य में उनके दामाद नारायण सिंह भी संलग्न थे । नारायण सिंह को रायपुर जेल में डाल दिया गया । नारायण सिंह जेल में बंद अन्य ब्रिटिश विरोधी कैदियों एवं सैनिकों को संगठित करने में लगे रहे । मेरठ में हुए सैन्य विद्रोह की चर्चा रायपुर जेल तक पहुंच चुकी थी । नारायण सिंह विद्रोही कैदियों की सहायता से जेल की दीवाल तोड़ कर 28 अगस्त 1857 को भाग निकले । वे जेल तोड़कर भागने के बाद अपने समर्थक विद्रोहियों को संगठित करने में लग गए ।
सोनाखान में वीर नारायण सिंह की उपस्थिति की सूचना मिलते ही ईस्ट इंडिया कंपनी के सैन्य अधिकारी स्मिथ 20 नवंबर 1857 को सेना की टुकड़ी लेकर सोनाखान कूच किया । यह सैन्य टुकड़ी 29 नवंबर 1857 को सोनाखान के निकट पहुंची और पहाड़ी को चारों ओर से घेर लिया गया । सोनाखान की रसद आपूर्ति रोक दी गई और दोनों पक्षों में भीषण युद्ध प्रारंभ हो गया । कंपनी सेना के पास पर्याप्त मात्रा में बंदूक और गोला बारूद और पड़ोसी जमींदारों के सहयोगी सैनिक थे इसलिए कंपनी सेना विद्रोहियों पर भारी पड़ी । 2 दिसंबर को सोनाखान बस्ती को सोनाखान बस्ती को आग लगाकर जला दिया गया । वीर नारायण सिंह महिलाओं और बच्चों को कंपनी सेना के अत्याचार से बचाने बस्ती से हटा कर पहाड़ के जंगल में भेज चुके थे लेकिन विद्रोही साथियों को बचाने एक सहयोगी के साथ आत्म समर्पण कर दिए । वीर नारायण सिंह को बंदी बनाकर 5 दिसंबर को रायपुर लाया गया और 10 दिसंबर 1857 को मौत की सजा सुनाई गई । वीर नारायण सिंह को सैनिकों की उपस्थिति में वर्तमान पुलिस ग्राउंड में फांसी दिया गया । छत्तीसगढ़ के गौरव और भारत माता के महान सपूत के जीवन का अंत हो गया ।
सन 1909 में प्रकाशित रायपुर डिस्ट्रिक्ट गजेटियर में ए ई नेल्सन आईसीएस ने ,”सोनाखान आउट ब्रेक” शीर्षक में इस सैन्य अभियान का वृतांत संक्षेप में लिखा है । इस वृतांत को पढ़कर साहित्यकार स्व हरि ठाकुर ने “अमर शहीद वीर नारायण सिंह खंड काव्य” की रचना की थी जिसके आधार पर मध्यप्रदेश सरकार द्वारा 1957 में प्रथम शहीद घोषित किया गया था ।
मैं भारत माता के महान सपूत शहीद वीर नारायण के बलिदान दिवस पर सभी वीर शहीदों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करता हूं ।