ज़िन्दगी
बचपन से आज तक ना जाने कितने ख़्बाव देखें मैंने,
कुछ खट्टे कुछ मीठे,
कुछ धुंधली तो कुछ स्पष्ट,
कुछ उभरे कुछ अंधेरे में सिमटे।
हर तरफ़ हैं बेबसी,
ग़रीबी ये कैसी ज़िंदगी,
ना ख़्बाव है ना कोई ख़ुशी ॥
ईश्वर की मार ,
करमों का वार,
ख़ाली पेट में टकराव,
किश्त में खिंचाव,
पल पल सहमता जाए ,
ग़रीबी ये कैसी ज़िंदगी,
ना ख़्बाव है ना कोई ख़ुशी ॥
दूसरे के सुख की लालच नहीं,
दो वक़्त की रोटी मिलें ऐसी हालत नहीं,
बचपन गया अब उन सपनों की चाहत नहीं,
अपने दुःख में डुबकी लगाते हैं,
बाहर आकार मुस्कुराते संग ग़म छुपाते हैं,
ग़रीबी ये कैसी ज़िंदगी,
ना ख़्बाव है ना कोई ख़ुशी ॥
नाम -शालिनी मिश्रा
व्याख्याता
शासकीय हाईस्कूल कोठीगांव
