किसानों के मसीहा बाबा महेन्द्र सिंह टिकैत की 13 वीं पुण्यतिथि मनाई गई।

जल, जंगल, जमीन, पर्यावरण बचाने लिया संकल्प।

राजिम :- किसान मसीहा बाबा महेन्द्र सिंह टिकैत की 13 वी पुण्यतिथि को जल, जंगल, जमीन और पर्यावरण बचाने संकल्प दिवस के रूप में गरियाबंद जिला के पथर्रा राजिम में मनाया गया।    इस अवसर पर महात्मा टिकैत के संघर्षों पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए भारतीय किसान यूनियन के छत्तीसगढ़ प्रदेश महासचिव तेजराम विद्रोही ने कहा कि चौधरी महेन्द्र सिंह टिकैत जिन्हें आज किसानों के मसीहा के नाम से दुनिया भर में जाना जाता है उनका 15 मई को तेरहवीं पुण्यतिथि है। जिनका जन्म उत्तर प्रदेष के मुजफ्फरनगर जिला के सिसौली गांव में बाल्यान खाप परिवार में 06 अक्टूबर 1935 को हुआ था और रीड़ की हड्डी में कैंसर के कारण 75 वर्ष की आयु में 15 मई 2011 को मुजफ्फरनगर में उनकी मृत्यु हो गई थी। चौधरी महेन्द्र सिंह टिकैत को एक जुझारु किसान नेता के तौर पर पूरी दुनिया जानती है क्योंकि यह व्यक्ति किसी एक दिन में या किसी की मदद से किसानों का मसीहा नहीं बना बल्कि इस सख्सियत ने किसान हित में धूप-छांव, भूख-प्यास, लाठी-जेल की कभी परवाह नहीं किया। जब कभी किसान संघर्ष में कदम आगे बढ़ा दिये तो पीछे नहीं लिए और कभी महसूस हुआ कि उनके किसी निर्णय से किसानों या साथियों को नुकसान होने की संभावना तब निर्णय वापस लेने में अपने आत्मसम्मान का विषय भी नहीं बनाया। चौधरी महेन्द्र सिंह टिकैत को उनके पिता के देहांत हो जाने के बाद तब बाल्यान खाप का मुखिया बनाया गया जब वे केवल आठ साल के थे क्योंकि टिकैत जाटों के रघुवंषी गोत्र से ताल्लुक रखते थे लेकिन बाल्यान खाप में सारी बिरादरिया षामिल थी जिसके कारण टिकैत ने बचपन से ही खाप व्यवस्था को समझा और जाति से ऊपर किसान को स्थापित करने में जुट गये। वह हमेषा दूसरे खापों से गहरा संबंध रखते और 01 जुलाई 1987 को किसानों की हितों की रक्षा के लिए गैर राजनीतिक संगठन ’’भारतीय किसान यूनियन’’ की स्थापना किया। यह वह समय था जब चौधरी चरण सिंह की मृत्यु के बाद किसान राजनीति में एक तरह से षून्यता आ गयी थी। किसानों की हालत यह थी कि डरा सहमा किसान खाद, पानी, बिजली की समस्याओं को लेकर जब सरकारी कार्यालयों में जाता था तब उन्हें अपमानित कर भगा दिये जाते थे।

            भारतीय किसान यूनियन की स्थापना से पहले ही टिकैत जी ने जब देखा कि गांवों में बिजली न मिलने से किसान परेषान है उनकी फसलें सुख रही है, चीनी मिलें उनके गन्ने को औने-पौने दामों पर खरीदती है तो उन्होंने किसानों की समस्याओं को लेकर 01 मार्च 1987 को मुजफ्फरनगर के सामली कस्बे में स्थित करमूखेड़ी बिजलीघर को घेर लिया। पुलिस प्रषासन तीन दिनों तक कोशिश करते रहे कि किसी तरह किसान अपना धरना वापस ले। लेकिन टिकैत के नेतृत्व में जब किसान डटे रहे तब पुलिस ने किसानों पर गोलियां चला दी जिसमें दो किसान जयपाल और अकबर अली ने मौके पर ही दम तोड़ दिया। दो किसानों की षहादत के बाद टिकैत ने आन्दोलन बंद नहीं किया बल्कि विस्तार करते हुए 01 अप्रैल 1987 को किसानों की सर्वखाप पंचायत बुलाई जिसमें पूरे भारत में किसानों की एक लड़ाकू व मजबूत संगठन की अवधारणा को रखकर ’’भारतीय किसान यूनियन’’ की स्थापना की गई। आयोजित विशाल बैठक में निर्णय लिया गया कि सामली तहसील या मुजफ्फरनगर जिले में उनकी मांगों पर कोई विचार नहीं हो रहा है इसलिए मेरठ कमिशनरी का घेराव किया जाए। 27 जनवरी 1988 को मेरठ कमिशनरी पर लाखों किसानों ने खाने-पीने की साधन लेकर डेरा जमा दिया जो 35 सूत्रीय मांगों को लेकर 27 दिनों तक शातिपूर्ण आन्दोलन चला। उनके संघर्षों के कारण उन्हें महात्मा बाबा की उपाधि मिली। सत्ताईस दिन बाद टिकैत ने सरकार को गुंगी बहरी कहते हुए खुद यह आन्दोलन खत्म कर दिया और कहा कि कमिशनरी में उनकी सुनवाई नहीं हो रही तो वह लखनऊ और दिल्ली में दस्तक देंगे। इसके बाद हुए रेल रोको, रास्ता रोको आन्दोलन पर पुलिस दमन तेज हुआ आन्दोलन को और भी मजबूत करते हुए टिकैत जी 6 मार्च 1988 को दल बल सहित रजबपुर मुरादाबाद पहुंच गये और 110 दिनों तक किसानों के साथ धरने पर बैठ गए। 25 अक्टूबर 1988 को वे दिल्ली के बोट क्लब पहुंच गये जहां पर विजय चौक से इण्डिया गेट तक लाखों किसानों ने कब्जा कर लिया था। सात दिनों तक चले धरने में 35 सूत्रीय मांगों पर केन्द्र सरकार की प्रतिनीधियों के आष्वासन के बाद टिकैत ने बोट क्लब से धरना वापस लिया।

          चौधरी महेन्द्र सिंह टिकैत समुदायों के बीच सौहाद्रपूर्ण भाईचारे पर विश्वास करते थे। बताया जाता है कि 1987 में मेरठ में बहुत ही खौफनाक साम्प्रदायिक दंगे हुए थे जो तीन महीनों तक चला था। लेकिन टिकैत ने मेरठ शहर की सीमा से बाहर इसे जाने नहीं दिया। उन्होंने गांव-गांव जाकर पंचायत की तथा हिन्दुओं और मुसलमानों को एकजूट रखा। उनके मंच पर हमेशा एक मुसलमान नेता होता था और वह स्वयं किसानों के साथ मंच के नीचे बैठते थे। 1950 से 2010 तक सर्वखाप की कई महापंचायतों में सामाजिक कुरीतियों, नशाखोरी, भ्रूण हत्या, मृत्युभोज, और दहेज प्रथा पर नियंत्रण के लिए अभियाण चलाया। आज भी किसान भवन सिसौली में प्रत्येक माह के 17 तारिख को किसान दिवस का आयोजन किया जाता है जिसमें हजारों किसान आकर अपनी समस्याओं के बारे में विचार विमर्ष करते हैं। बाबा महेन्द्र सिंह टिकैत भले ही आज हमारे बीच नहीं रहे परंतु उनका योगदान व संघर्ष आज भी प्रासंगिक है। आज कॉरपोरेट घरानों के हित में जल जंगल जमीन की लूट मची जिससे पर्यावरण को भारी क्षति हो रही है औधोगिक लाभ के लिए घने जंगलों के साथ साथ नदियों और पहाड़ों को भी नहीं छोड़ रहे हैं जिसे बचाने का संघर्ष जारी है और जारी रहेगा क्योंकि बाबा महेन्द्र सिंह टिकैत के संघर्षों का आलोक हमें प्रेरणा देती है।

इस अवसर पर भारतीय किसान यूनियन जिला गरियाबंद मीडिया प्रभारी ललित कुमार एवं किसान संगठन के साथी प्रदीप वर्मा, प्रहलाद साहू, नारद साहू, नरेश यादव , टीकम पाल, डोमन सोनकर, रामाधार पाल, दिलीप धीवर, नरहर यादव, बेदराम साहू, जगत पाल, चंद्रिका वर्मा, खोरबहरा साहू आदि उपस्थित रहे।