अनचाहे से मौन—

अनचाहे से मौन—
निज स्वार्थ के कारण,
सारे नीति बदल गए|
लोग तो वही है साहब,
बस राजनीति बदल गए।।

जिस पर किया भरोसा,
वही गद्दार निकल गए।
कुछ बने अवसरवादी,
कुछ खुद्दार निकल गए।।

अपनी धाक जमाने हेतु,
आपस में विपक्षी हो गए।।
स्वार्थ की रोटी सेकने वाले,
देखो एकपक्षीय हो गए।।

जिस पत्तल में घी लगी थी,
उसे मन भर कर चाँट गए।
अपनी जेब भरने के लिए
वो अपनों को बाँट गए।।

कितनों को गिनोगे कि,
इस लाइन में कौन-कौन है?
कुछ जानकर मुस्कुरा रहे,
कुछ अनचाहे से मौन है।।
रचनाकार:-श्रवण कुमार साहू “प्रखर”
राजिम, गरियाबंद, (छ. ग.)