सावन सुन्दरी

सावन सुन्दरी

सतरंगी रंग म नहाके निकले,
अपसरा के आँखी चमके मोती।
दौना पान जईसे ममहावय देंह,
चंदा के अंजोर बगरे सबो कोती।।

हरियर-हरियर लुगरा पहिने,
झूलना, झूलत हें फूलवारी।
अंग म सोलह सिंगार करके,
नाचत आवत हें सावन सुन्दरी।।

कोनों गावैं मया-पिरीत के गीत,
कोनों करैं खूब हँसी-ठिठोली।
मन सुआ होगे बईहा रे संगी,
सुनके ऊँखर मैना कस बोली।।

माई लोगिन के सुघरई ल देख,
मूर्छा हो जाथे करिया बादर।
पहिन-ओढ़ के आवैंय जम्मों,
छत्तीसगढ़ माता के रूप ल धर।।

बिधुन होके खेलथें कई खेल,
कई हारथें, कई अऊवल आथें।
सुन्दरी, पाथे सम्मान अऊ ईनाम,
मुकूट पहिनके, रानी बन जाथें।।

कवि- अशोक कुमार यादव मुंगेली, छत्तीसगढ़
जिलाध्यक्ष राष्ट्रीय कवि संगम इकाई।