
राजिम :- उन्हें भरत जी की चिंता हो आई। दशरथ महाराज भी कहते थे, कौशल्या। मुझे भरत की बहुत चिंता है, कहीं राम वनवास की आँधी भरत के जीवन दीप को बुझा न डाले। राम और भरत मेरी दो आँखें हैं, भरत मेरा बड़ा अच्छा बेटा है, उन दोनों में कोई अंतर नहीं है। और सत्य भी है, संत और भगवान में मात्र निराकार और साकार का ही अंतर है। अज्ञान के वशीभूत होकर, अभिमान के आवेश में आकर, कोई कुछ भी कहता फिरे, उनके मिथ्या प्रलाप से सत्य बदल नहीं जाता कि भगवान ही सुपात्र मुमुक्षु को अपने में मिला लेने के लिए, साकार होकर, संत बनकर आते हैं। वह परमात्मा तो सर्वव्यापक है, सबमें है, सब उसी से हैं, पर वह सब में परिलक्षित नहीं होता, संत में भगवान की भगवत्ता स्पष्ट झलकने लगती है। तभी तो जिसने संत को पहचान लिया, उसे भगवान को पहचानने में देरी नहीं लगी, जो सही संत की दौड़ में पड़ गया, वह परमात्मा रूपी मंजिल को पा ही गया। भरत जी आए तो कौशल्या जी को लगता है जैसे राम जी ही आ गए हों। भरत जी कहते हैं, माँ। कैकेयी जगत में जन्मी ही क्यों? और जन्मी तो बाँझ क्यों न हो गई? कौशल्या जी ने भरत जी के मुख पर हाथ रख दिया। कैकेयी को क्यों दोष देते हो भरत। दोष तो मेरे माथे के लेख का है। ये माता तुम पर बलिहारी जाती है बेटा, तुम धैर्य धारण करो।
यों समझते समझाते सुबह हो गई और वशिष्ठ जी का आगमन हुआ। यद्यपि गुरु जी भी बिलखने लगे, पर उन्होंने भरत जी के माध्यम से, हम सब के लिए बहुत सुंदर सत्य सामने रखा। कहते हैं, छ: बातें विधि के हाथ हैं, इनमें किसी का कुछ बस नहीं है।
“सुनहू भरत भावी प्रबल बिलखि कहेऊ मुनि नाथ। हानि लाभ जीवन मरण यश अपयश विधि हाथ॥”
इसीलिए लोकेशानंद कहता है कि अपरिहार्य परिस्थिति में किसी को भी शोक नहीं करना चाहिए।
