अभागा पिता— (पितृ दिवस पर एक पिता का दर्द)

अभागा पिता—
(पितृ दिवस पर एक पिता का दर्द)
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सचमुच,मैं एक अभागा पिता हूँ,
जो हर दर्द,गम हँसकर पीता हूँ||
मेरे दर्द को किसी ने जाना नहीं,
मुझे माँ के जैसा क्यों माना नहीं||

बच्चों से बेहद प्यार करने वाले,
पिता को धृतराष्ट्र कह देते हैं|
पर बच्चों को सर पे चढ़ाने वाली,
माँ को कोई गांधारी नहीं कहते||
आखिरकार पितृत्व के भाव को क्यूँ,
आज तक किसी ने पहचाना नहीं–

माना कि माँ फूट-फूट कर रोती है,
पर मैं भी तो घुट-घुट कर रोता हूँ|
सच है,माँ बच्चों को जन्म देती है,
किंतु आजीवन भार मैं ही ढोता हूँ||
क्यों पिता के समर्पण को किसी ने,
माँ की ममता के तुल्य माना नहीं-

माँ की आँखों से बहती जल धारा,
हर किसी को बहाकर ले जाती है|
पर पिता के हृदय में उमड़ा ज्वार,
किसी को क्यूँ नज़र नहीं आता है||
माँ रामायण सी पूजी जाती है किंतु,
मुझ पिता को गीता क्यों माना नहीं–

माँ के देखे सपनों को,आखिरकर,
पिता बन,मैं ही सजाया करता हूँ|
बच्चों को जो कौर खिलाती माता,
उसे रात दिन मैं ही कमाया करता हूँ||
पिता के खून-पसीने को आज तक,
माँ की रोटी से बड़ा क्यों माना नहीं–

माता की ममता के संग पिता का,
तुम जरा आत्म सम्मान जोड़ दो|
इतना भी नहीं कर सकते हो तो,
अब पितृ दिवस मनाना छोड़ दो||
मैं इतना समझ जाऊंगा कि मेरे,
अपनों ने कभी अपना माना नहीं–

रचनाकार:-श्रवण कुमार साहू, “प्रखर”
शिक्षक/साहित्यकार, राजिम, गरियाबंद