क्या नार्को टेस्ट से पुरी होगी झीरमघाटी की घटना की जांच?

छुरा -परमेश्वर राजपूत

छुरा :- झीरमघाटी में हुए घटना राज्य सहित देश के लिए एक बड़ी दुखद घटना थी जिसमें कांग्रेस के बड़े नेताओं सहित कई लोग शहीद हुए। 25 मई 2013 को हुए इस घटना ने राज्य सहित देश को भी एक बड़ी क्षति हुई थी। जिसमें किसी ने अपना पिता खोया, किसी ने अपना बेटा और कितनों ने अपना पति खोया, सरकार के द्वारा गठित जांच ऐजेंसी ने भी अभी तक इस घटना की तह तक पहुंच जांच पुरी नहीं कर पाई। वास्तव में जो परिवार अपना कोई खोता है तो उसका दर्द और जीवन भर की पीड़ा क्या होता है।

ये उस परिवार के सिवा कोई और इस दुख का दर्द एहसास नहीं कर पाता है। आज इस घटना के श्रद्दांजलि दिवस पर कुछ अफसर व नेताओं के नार्को टेस्ट की मांग कांग्रेसी नेता उठा रहे हैं लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या नार्को टेस्ट के आधार पर न्यायालय में सजा सुनाई जाती है? या कोई जांच एजेंसी इस आधार पर जांच पुरा कर न्यायालय को रिपोर्ट सौंपती है? यह आम आदमी के लिए समझ पाना मुश्किल है। इसी प्रकार टेस्ट की हम बात करें तो 23 जनवरी 2011 को गरियाबंद जिले के छुरा नगर में घटित घटना पत्रकार उमेश राजपूत हत्याकांड में भी कई वर्षों तक पुलिस की जांच में अपराधियों के नहीं पकड़े जाने के बाद सात से आठ संदेहियों का ब्रेन मेपिंग टेस्ट अहमदाबाद गुजरात से कराया गया था।

जिसमें प्रभावशील लोगों के द्वारा सुपाड़ी देकर हत्या कराने एवं इस हत्याकांड की जानकारी किसको है किन लोगों के आदमियों के द्वारा उमेश राजपूत की हत्या कराई गई यह स्पष्ट ब्रेन मेपिंग रिपोर्ट में स्पष्ट कर दिया गया था।लेकिन कानून की जानकारों की मानें तो इस आधार पर न्यायालय सजा नहीं सुनाती है ये जांच एजेंसियों के जांच में सहायक होता है किंतु इस घटना में रिपोर्ट के आधार पर न पुलिस जांच पुरा कर पाई और नहीं देश के बड़ी जांच एजेंसी सीबीआई।आखिर इसका औचित्य क्या है जिसमें लाखों रुपए खर्च कर इस प्रकार की जांच कराई जाती है यह आम आदमी के समझ से परे नजर आता है। और एक बार फिर झीरमघाटी कांड में नार्को टेस्ट की मांग उठी है जिसमें आनेवाले दिनों में जांच एजेंसियां इसमें कहां तक सफलता हासिल करेगी या केवल सफेद हाथी साबित होगा यह आनेवाला समय ही बताएगा।