शासकीय भूमि का रसूखदारों द्वारा किया जा रहा है बंदरबाट।

किरंदुल / रणवीर सिंह चौहान

किरंदुल :- मामला दक्षिण बस्तर किरंदुल नर्सरी का जहाँ शासकीय भूमि को आंध्रा के किसी नायडू नाम के व्यक्ति को 70 लाख में बेच दिया गया। 20 लाख लेने के पश्चात 50 लाख शेष बचा होना बताया गया। जहाँ एक तरफ सरकार के पास जन हित के लिए भूमि नहीं है। सरकारी उपक्रम के लिए जमीन की कमी बताई जाती है वहीँ भर्ष्टाचार में लिप्त कुछ नेता व जनप्रतिनिधि सरकारी सम्पत्ति को अपनी सम्पत्ति समझकर बेचते आ रहे हैं।

विगत 80 वर्ष पुरानी दक्षिण बस्तर नर्सरी की इस जमीन पर लगभग 160 से भी ज्यादा काजू के फलदार बड़े वृक्ष को काटकर वहीँ पर जमीदौज कर दिया गया। वहां रहने वाले अनेक परिंदों का बसेरा उजाड़ा गया। इन सारी प्रक्रियाओं को करते वक़्त यहाँ की जनता को गुमराह किया गया। उन्हें झूठा आश्वासन दिया गया। धीरे धीरे जब राज़ खुला तब जनता जागी समझ में आया की इस सरकारी जमीन को बेच दिया गया है।

इस जमीन को समतली करने का कार्य आर्सेलर मित्तल कम्पनी के द्वारा किया गया। जिस पर लगभग 250 ट्रक कंपनी का गार्बेज मटेरियल डालकर उसके ऊपर एक मोटी परत मुरुम का डाला गया है, वेस्ट मटेरियल की वजह से आस पास के लगभग 7 से 8 बोर का पानी पीने योग्य नहीं रहा।

इस शासकीय भूमि का बंदरबाट करने में जनप्रतिनिधि नेता व अधिकारी पर बड़े राजनेताओं का सरक्षण प्राप्त मालूम होता है। इस सम्बन्ध में दक्षिण बस्तर उद्यानिकी प्रभारी नवल सिंह मरावी से संज्ञान लेने पर उन्होंने बताया की भविष्य में इस जमीन पर क्या बनेगा इसे संतालीकरण क्यों किया गया है उन्हें नहीं मालुम लेकिन फलदार काजू के वृक्षों को काटा गया है ये जानकारी है।

जिला दंतेवाड़ा उप वन मंडल अधिकारी अशोक सोनवानी ने कहा की उन्हें इस सम्बन्ध में कोई जानकारी नहीं है। जांच करने के पश्चात उचित कार्यवाही की जाएगी। समाचार लिखे जाने तक भूमि माफिया वा गुण्डो की तरफ से धमकियों का दौर प्रारम्भ हो चुका है जान से मारने की धमकियां दी जा रहीं हैं भूमि माफिया राजनैतिक रसूख वाले व्यक्ति हैं।

    झूठे केस में जेल भिजवा देने की धमकी दी जा रही है प्रशासन पूरे प्रकरण में राजनैतिक दबाव के चलते मौन है वैसे भी बस्तर में पत्रकार विपरीत वा खतरनाक स्थिति में काम करता है एवम सुदूर नक्सल गड़ से समाचारों का संकलन करता है कई पत्रकारों की हत्या भी हो चुकी है अतः प्रशासन की यह चुप्पी खतरे का संकेत है, सिर्फ नाम के लिए हम लोक तंत्र का चौथा स्तंभ हैं सरकार को इस पूरे मामले को गंभीरता से लेना चाहिए अन्यथा इसके परिणाम अत्यंत गंभीर हो सकते है, पत्रकार सुरक्षा कानून लागु होने के बावजूद भी भू माफियाओं के हौसले बुलंद हैं।