किरंदुल / रणवीर सिंह चौहान
किरंदुल:– उपरोक्त कम्पनी को इनकी कारगुजारियों की वजह से ” ईस्ट इंडिया कंपनी” के नाम से भी जाना जाता है जो किसी मि नही सुनते यदि एक शब्द में कहा जाए तो बी आई ओ एम (एन एम डी ) के ऊपर यह कहावत चरितार्थ होती है,”न खाता न बही जो एन एम डी सी कहे वही सही कंपनी के काम करने का तरीका यह है कि लोग जहर मिला हुआ पानी पीने के लिए विवश हैं अब तक सैकड़ो लोग स्वर्ग सिधार चुके हैं, पानी मे लौह चूर्ण कज बहुतायत की वजह से लोगों को किडनी व लिवर की समस्या से जूझते हुए इस दुनिया से अलविदा होना अब नियति बन चुकी है उच्च अधिकारी कंपनी से उपकृत होकर अपनी आंखें बंद किये रहते है।

पूरे शहर में धूल का गुबार 24 घण्टे देखा जा सकता है यहां की कुछ यूनियन भी मजदूरों की सुरक्षा व उनके हितों की रक्षा के नाम पर मौजूद हैं जो स्व हित मे अपना समय व्यतीत करती देखी जा सकतीं हैं आलम यह है कि कर्मचारी स्थानांतरण हो जाने के भय से चुपचाप जुल्म सहते बंधक मजदूरों की तरह काम करते रहते हैं एवम अपने रिटायर होने के पूर्व ही कदाचित इस दुनिया को अलविदा कर जातें हैं, कंपनी लाखों करोड़ों रुपये इनके नेताओं व जनप्रतिनिधियों पर खर्च कर देती है किन्तु बस्तर के गरीब आदिवासियों व व्यपारियों के इलाज के लिए इनके पास पैसे नहीं होते किन्तु कंपनी के अधिकारी इलाज के नाम पर भारत भरमड़ पर जरूर निकल जाते हैं यूनियन के पदाधिकारी भी इस सुविधा को हासिल करने के लिए प्रतिस्पर्धा करते हुए स्पष्ट देखे जा सकते हैं बाकी जनता तो लौह अयस्क चूर्ण के बादलों के बीच अपना जीवन गुजारने के लिए विवश है, यदि यहाँ जनता के पास कोई विकल्प होता तो वह अपने घर से कभी नहीं निकलती किन्तु क्या करें पेट का तकाजा है। घर से बाहर तो जाना ही होगा और लौह चूर्ण खा कर तकलीफ भरी जिंदगी जीना ही होगा।
सरकार की तरफ से इस कम्पनी को कई एवार्ड प्राप्त है, मानव जीवन को नरकीय बनाकर क्षेत्र की जनता को तकलीफ भरा जीवन देकर क्या ये इस अवार्ड के हकदार हैं ..?
