राजिम। महासमुंद के मधुरिमा लोककला मंच के संचालक एवं एंकर पवन चंद्राकर ने मीडिया से चर्चा करते हुए कहा कि राजिम के इस विशाल मंच की अपनी अलग पहचान है इन्हें किसी से तुलना करना ठीक नहीं है। मेरा हमेशा प्रयास रहा है कि मैं छत्तीसगढ़ की मूल संस्कृति को आगे ले जाने के लिए हर संभव प्रयास कर रहा हूं। लोग आधुनिकता की चकाचौंध में न फंसे, अपनी संस्कृति ही अपनी पहचान होती है। इस बात का ख्याल रखा जाना बहुत जरूरी है। प्रदेश में कलाकारों की कमी नहीं है बस उन्हें पहचान देना बहुत जरूरी है। हर व्यक्ति के अंदर कुछ न कुछ कला होती है उसे बाहर निकालने का काम करना जामवंत के समान है। हमारे प्रत्येक कार्यक्रमों में छत्तीसगढ़ दर्शन होता है। कर्मा, ददरिया, सुआ की प्रस्तुति को देखकर लोग झूम उठते हैं। मेरे घर में संगीत का कोई माहौल नहीं रहा, लेकिन मेरा झुकाव हमेशा रहता था और मैं ऐसे कार्यक्रमों में चला जाता तो मेरे घर के लोग हमेशा विरोध करते थे। मैं उस विरोध को सहज भाव से सुन लेता और अपना काम करता रहता, लेकिन बाद में जैसे-जैसे मुझे प्रसिद्धि मिली, घर के लोगों ने भी शाबाशी देना शुरू कर दिया। लोकरंग अर्जुंदा, रंग सरोवर से मैंने बहुत कुछ सीखा। रामायण मंडली की खूब प्रस्तुति दी। महाराष्ट्र, उड़ीसा में बहुत ज्यादा कार्यक्रम दिए हैं।
खुद का पैसा लगाकर कला को दिया आकार-
जानने, समझने एवं सीखने की ललक मुझमें बहुत ज्यादा थी उस समय रामलीला का मंचन करते थे। मैं दूसरे के कार्यक्रम को देखता तो मुझे भी लगता कि हमारा भी टीम होना चाहिए। इसके लिए मैंने घर से भी पैसा लगाया और यहां तक कि कलाकारों को अपने घर से मजदूरी देता था। धीरे-धीरे करके हमारी नई टीम बन गई और पिछले 8 सालों से लगातार कार्यक्रमों की प्रस्तुति दे रहे हैं।
छत्तीसगढ़ी फिल्मों में झुकाव नहीं-
छत्तीसगढ़ी फिल्मों में मेरा झुकाव बिल्कुल नहीं रहा। मैं लोक मंच में ही अपनी संस्कृति को उकेरना चाहता हूं। छत्तीसगढ़ के तमाम बड़े मंचों में मेरी उपस्थिति होती रहती है। आज भी हमारे कार्यक्रम में आधुनिक वाद्य यंत्र नहीं बजाया जाता। पुराने वाद्य यंत्र मुझे बहुत अच्छा लगता है। छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध लोक गायक खुमान साव मेरे प्रेरणास्रोत रहे हैं उससे मैं कई बार मिला हूं। कार्यक्रम देने के लिए विदेश जाने की इच्छा है। इसके लिए खूब मेहनत भी कर रहे हैं आगे भगवान राजीवलोचन की मर्जी।
अभ्यास सफलता का मूल मंत्र-
प्रत्येक कलाकार को चाहे वह सीनियर हो या जूनियर निरंतर अभ्यास करते रहना चाहिए इससे कला निखरकर प्रकट होती है। सस्ती लोकप्रियता के चक्कर में ना पड़े बल्कि मेहनत करें सफलता आपके कदम चूमेगी। उनका स्पष्ट रूप से कहना है कि वर्तमान सरकार ने छोटे से लेकर बड़े कलाकारों को भी इस बड़े मंच में मौका देने का अभूतपूर्व काम कर रही है इससे कलाकारों को अवसर मिला है जिसे नकारा नहीं जा सकता।

