भले ही हम आकाश छु लें लेकिन माटी को न छोड़े – पीसीलाल यादव।

राजिम:- पाश्चात्य संगीत का कोई जीवन नहीं है। जबकि लोकगीत, लोक संगीत एवं लोकधुन में भविष्य की अपार संभावनाएं है। भले ही हम सफलता के बलबूते पर आकाश छु लें परन्तु माटी को न छोड़ें। क्योंकि हमारी जड़ मिट्टी में ही है। जो जड़ मिट्टी से अलग हो जाते है। वह नष्ट हो जाता है। उक्त बातें मीडिया सेंटर में पत्रकारों से बात करते हुए छत्तीसगढ़ के प्रसिध्द लोकगायक एवं साहित्यकार पीसीलाल यादव ने कहीं। उन्होंने मुख्य महोत्सव मंच पर दूध मांगरा की शानदार प्रस्तुति दी।
छत्तीसगढ़ के विरासत, तीज-त्यौहार को सरकार दे रही महत्वपूर्ण स्थान

श्री यादव ने बताया कि इस बार राजिम माघी पुन्नी मेला का स्वरूप में बहुत कुछ बदला हुआ नजर आ रहा है। मंच सुव्यवस्थित है तथा समय का विशेष ध्यान रखा जा रहा है। कार्यक्रम 08 बजे शुरू होना है तो नियत समय पर दर्शकों को प्रस्तुतिकरण देख रहे हैं। पहली बार इस तरह से व्यवस्थाओं का शतप्रतिशत पालन ने हमारा दिल जीत लिया। प्रदेश सरकार ने सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के द्वारा छत्तीसगढ़ के विरासत, तीज-त्यौहार आदि को महत्वपूर्ण स्थान दिया है। युवाओं को मौका मिल रहा है, उम्रदराज को सम्मान दिया जा रहा है। इससे बड़ी बात और क्या हो सकती हैं।
परिवार से मिला सींखने का मौका

कला के क्षेत्र में परिवार से मुझे सींखने का मौका मिला। सुखीराम निषाद नाचा के कलाकार थे। उनके अभिनय ने काफी प्रभावित किया। चंदैनी गोंदा से प्रेरणा मिली सन् 1976 में लोककला मंच में पांव रखा। दूधमांगरा लोककला मंच तब से लेकर लगातार चल रही है। दूध पवित्रता का प्रतीक है तथा मोंगरा अर्थात फूल संस्कृति है। अपनी माटी महतारी के गौरव और स्वाभिमान के गंध को लोगों तक पहुंचाना दूध मोंगरा का उद्देश्य है। घुरवा राम मरकाम, दुखिया बाईं, कुसुमलता ठाकुर, मुक्ता ठाकुर, उदय राम देवांगन हमारी संस्था के कलाकार रहे हैं।
साहित्य में सबसे ज्यादा समय देता हूं
डॉ. पीसीलाल यादव ने आगे बताया कि साहित्य में सबसे ज्यादा समय देते हैं। इसके लिए सहपाठी की जरूरत नहीं होती। साहित्य रचना अकेले ही करते है। जबकि लोककला के लिए गीत संगीत कोरस की आवश्यकता होती है।
लोककला पर 35 साहित्य
हमारी संस्था लोगों का मनोरंजन ही नहीं करती, बल्कि समाज को संदेश भी देते हैं। संस्कृति को संरक्षित करने का लगातार प्रयास किया जा रहा है। साहित्य, सांस्कृतिक, कला, जो वाचिक परम्परा हैं। लोक कलाकारों से मिलकर उनके गीत कथाओं को लिपिबध्द कर 35 साहित्य प्रकाशित कर चुके है। लोककला जो एक कंठ से दूसरे कंठ जाती है उसे संयोजित कर पुस्तक का रूप दे दिया।
विवाह संस्कार पर संकलित किया 172 गीत
श्री यादव ने अपने पुराने दिनों को याद करते हुए बताया कि मैं खुद अपने परिवार के बुजुर्ग से पूछा कि विवाह गीत कितने होते है। उन्हांने बताया कि जितने नेंग उतने विवाह गीत। मैनें अपनी बेटी की शादी में टेपरिकार्ड रख दिया। उसमें 172 गीत मिलें जिस पर किताब लिखा गया है। प्रतियोगी परीक्षाओं के प्रतिभागी इसे पढ़ते है।
छत्तीसगढ़ी फिल्म कारी और रघुवीर में किया अभिनय
मेरा झांपी आडियो किसेट आया है जिसे बहुत प्यार मिल रहा है। लोककला मंच के अलावा छत्तीसगढ़ी फिल्मों में गीत लिखा हूं, अभिनय भी किया हूं जिनमें प्रमुख रूप  से फिल्म कारी, रघुवीर, तीजा के लुगरा, अब्बड़ मया करथौ आदि। एक हिन्दी फिल्म हल और बंदूक में गीत लिखा था। वह आयी कि नहीं मुझे पता ही नहीं चला।
गीत वह है जिसे परिवार के लोग एक साथ बैठकर सुने
पीसीलाल यादव ने दूध मोंगरा में 80 प्रतिशत लोकगीत से लिया गया है जिसमें ददरिया, करमा, देवार करमा, गोड़ी करमा आदि है। गीत कनिहा में करधन…. सन् 1976 में दूध मांगरा के कलाकार दुखिया बाईं मरकाम ने आवाज दिया था। नकल की प्रवृत्ति घातक है। मौलिक सृजन कम हो रहे है। जिस पर ध्यान देना जरूरी है। उन्होंने आगे बताया कि हमारी संस्था नये कलाकारों को जोड़ने का काम कर रहें है। गीत तो वह है जिसे परिवार के लोग एक जगह बैठकर सुने। इस मौके पर लोक गायिका सरस्वती निषाद, सुखियारिन मानिकपुरी, मुख्य गायक गौतमचंद जैन, गायक द्वारिका यादव मौजूद थे।