राजिम मेला (भाग-४)
राजिम मेला कइसे घुमबो—–
गरीब मनखे मुड़ धर बइठे,लइका के रोवाई म|
राजिम मेला कईसे घुमबो,नंगत के महंगाई म||
बीस रुपिया के गुपचुप लेबे,दु झन ल पुरे नहीं|
थूक-थूक म बरा कभु,कोनो जगा म चुरे नहीं||
अब तो कोनो मजा नी हे,खाबे त रस मलाई म-
लईका ल कइसे समझावंव,मोर गरीबी के दुखड़ा|
कइसे के खिलौना लेवंव,कतका के चना ऊखरा||
जी निकले कस लागथे,अब रहचुली के चढ़ाई म-
लुगरा बिसावंव बाई बर कि,दाई बर लेवंव गोली|
अब तो सहि जाय नहीं,साहूकार के उराठी बोली||
जम्मो पैसा कौड़ी सिरागे,खातू कचरा के लेवाई म
गरीब मनखे कैसे चढ़हूं,मंदिर देवाला के सीढ़िया|
बिन पैसा परसाद नी मिले,नरियर हो या पीड़िया||
सोचत-सोचत रतिहा पहागे,आँखि के रमजाई म-।
रचनाकार:– श्रवण कुमार साहू, “प्रखर”
शिक्षक/साहित्यकार, राजिम, गरियाबंद (छ.ग.)

