किसान आंदोलन को ताकत गाँव से मिल रही है

 

*किसान नेताओं के खिलाफ राष्ट्रीय जाँच एजेंसी का उपयोग खिसियानी बिल्ली के समान है*

केंद्र सरकार द्वारा कृषि सुधार के नाम पर पारित कानूनों आवश्यक वस्तु (संशोधन) अधिनियम 2020, कृषि उपज व्यापार एवं वाणिज्य (संवर्धन एवं सुविधा) अधिनियम 2020 और मूल्य आश्वासन एवं कृषि सेवाओं पर करार (सशक्तिकरण एवं संरक्षण) अधिनियम 2020 को रद्द करने तथा न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी कानून बनाने की मांग को लेकर जारी दिल्ली के अलग अलग सीमाओं पर जारी किसान आंदोलन को 96 वें दिन पूरा हो गया है।

लगातार 96 वें दिन से जारी किसान आंदोलन के साथ अखिल भारतीय क्रांतिकारी किसान सभा के साथीगण छत्तीसगढ़ व अन्य राज्यों से लगातार जुड़े हुए हैं। सरकार के साथ 11वें दौर की चर्चा के बाद बातचीत के लिए अब तक कोई ठोस पहल सरकार द्वारा नहीं किया जा रहा है हालाँकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि हम किसानों के साथ बातचीत करने के लिए एक फोन कॉल की दूरी पर है लेकिन उसके बाद किसानों को उन्होंने आंदोलनजीवि, परजीवी कहकर आंदोलनकारी किसानों व उनके समर्थकों को अपमानित भी किया। 26 जनवरी के बाद किसान आंदोलन कमजोर होने, आंदोलनकारी किसानों की थक जाने संबंधी कुछ समाचार भी आई किन्तु वह सब झूठ साबित हुआ है।

सिंघु बार्डर में 96 वें दिनों से किसान आंदोलन में डटे कुरुक्षेत्र हरियाणा के किसानों अजेब सिंह,साहेब सिंह, राजकुमार ढांडा, पंजाब के सोल्हानी जिला से आये किसानों रघुबीर सिंह, जसकरण सिंह, करतार सिंह, हरभजन सिंह, बूटा सिंह तो जिला जींद हरियाणा के मोर पत्ती नरवाना खाप पंचायत के राजेश कुमार मोर, अजय मोर, दर्शन मोर, विक्रम मोर, मंजीत मोर, करसेम मोर, अमित कुमार ने अखिल भारतीय क्रांतिकारी किसान सभा के सचिव तेजराम विद्रोही को बताया कि हम अपने खेती किसानी की अस्तित्व बचाने आंदोलन में शामिल हैं और जब तक तीन काले कृषि कानून वापस नहीं होंगे तब तक वापस नहीं जाएंगे। किसान आंदोलन में हो रहे खर्चों, राशन आदि के सवाल पर सभी ने कहा कि सभी किसान प्रति एकड़ 100 रुपये की दर से गाँव पंचायत में राशि जमा किया है। अपने घर एवं खेतों की काम प्रभावित न हो इसके लिए दिनों के हिसाब से किसानों, महिलाओं, युवाओं की पारी लगाई गई है जो नियमित रूप से आंदोलन में शामिल होते हैं। धरनारत किसानों और नेशनल हाईवे में टेंट लगाकर बैठे किसानों के लिए गाँव पंचायतों में जमा सहयोग राशि से आटा, दाल, चावल, सब्जियों की व्यवस्था की जा रही है। सब्जी एवं दूध उत्पादन करने वाले ऐसे भी गाँव है जिन्होंने पारी लगा रखा है कि सप्ताह में एक दिन पूरे गाँव का दूध एवं सब्जियां आंदोलनकारी किसानों तक पहुंचाएं। बातचीत से साफ दिखाई देता है कि किसान अब तक आंदोलन से थके नहीं है बल्कि और भी दिन ब दिन मजबूत होते जा रहे हैं परिणाम को लेकर आशावादी है और कह रहे हैं कि सरकार जितना जल्दी किसानों की माँगे मान ले उतना ही भारतीय जनता पार्टी के लिए अच्छा होगा, नहीं तो जिस तरह महापंचायतों के माध्यम से भाजपा नेताओं का बहिष्कार किया जा रहा है आने वाले समय में भाजपा को भारी राजनीतिक क्षति का सामना करना होगा। किसान आंदोलन को गांवो से ताकत मिल रही है केन्द्र सरकार द्वारा किसान नेताओं के खिलाफ व आंदोलन में हो रही खर्चे को लेकर राष्ट्रीय जांच एजेंसी लगाना खिसियाए बिल्ली द्वारा खम्भा नोचने के समान है।

तेजराम विद्रोही
सचिव
अखिल भारतीय क्रांतिकारी किसान सभा
सिंघु बार्डर से 28/02/2021