पढ़िए कविता :- आभार है माँ तेरा

कविता :- आभार है माँ तेरा

माँ आभार है तेरा
मुझे दिया जन्म तूने
अपना दूध पिला
दुनिया से लड़ने के लिये बनाया तूने।

प्रकृति आभार है तेरा
तूने मेरे जीवन मे
बेहतरीन रंगो को भरा
मेरे विचारों में
जीवन के तरंगो को भरा।

आभार है उस पंछी का
जिसने मुझे हवा में
उड़ना सीखाया
एक एक दानों को
सहेजने का सलीका सीखाया।

आभार है उस नदी का
जिसने मुझे सबको
अपने में समाहित कर
बहना सीखाया।

आभार है उस बया के घोसले का
जिसने मुझे जीवन के
ताने बाने बुनना और
करीने से सजाना सीखाया।

आभार है उस हवा का
जीवन से जिसने लड़ना सीखाया
जीवन की गति को
संतुलित करना सीखया।

आभार है उस गुरु का
जिसने मुझे दिया अक्षर ज्ञान
सीखाया मुझे खेल गणित का
और पढ़ाया विज्ञान।

जीवन में सब कुछ पाकर
खुशियों को सबको बांट कर
खुशहाल जीवन के लिये
“आभार” है माँ और प्रकृति का।

लगभग 17 वर्षों तक देशबंधु के सप्ताहिक छत्तीसगढ़ी ‘मड़ई’ का संपादन कर चुकी सुधा वर्मा जी कविताओं के अतिरिक्त लघु कथा, कहानी, नाटक, अनुवाद, उपन्यास आदि विभिन्न विधाओं में निरंतर लेखन करती रही है. उच्चतर माध्यमिक शाला में व्याख्याता पद पर अपनी सेवाएं दे चुकी सुधा जी का साहित्यिक सफर चार दशकों से भी अधिक पुराना है. अब तक उनकी 17 पुस्तकों का प्रकाशन हिंदी और छत्तीसगढ़ी में हो चुका है. संस्मरण विधा पर आपकी एक पुस्तक अभी प्रकाशाधीन है.