
विभिन्न पत्रकार संगठनों से विभिन्न मांगे उठी है कि पत्रकार सुरक्षा कानून बनाया जाये ?
पत्रकारों को फ्रंट लाइन कोरोना वारियर्स घोषित किया जाये ?
पत्रकारों के लिये सरकार बीमा सुविधा प्रदान करे ? इत्यादि !
विवाद तब गहराया जब सर्वप्रथम मध्यप्रदेश प्रदेश सरकार में CM श्री शिवराज सिंह जी ने केवल अधिमान्यता प्राप्त पत्रकारों के लिए बीमा सुविधा प्रदाय करते हुये उन्हें फ्रंट लाइन कोरोना वारियर्स घोषित कर दिया ! तब शुरू हुयी, खोज और आत्म-मन्थन, कि “पत्रकार कौन?”
क्या केवल “अधिमान्यता” प्राप्त पत्रकार ?
सत्ता से सवाल ने भी पत्रकारों क़ी कानूनी पहचान पर सवाल उठाये ? इसका परिणाम यह हुआ कि किसी भी पत्रकार या पत्रकार संगठन ने हमारी अभिव्यक्ति पर सवाल नही उठाये, बल्कि बड़े पेमाने पर देशभर में हमारी अभिव्यक्ति को स्वम् पत्रकारों द्वारा ही वायरल किया गया ! क्योकि सच का समर्थन करना,सच का सामना करना मजबूरी जो ठहरी ?
हमारी अभिव्यक्ति के वायरल होने का असर यह हुआ कि भोपाल में कई ऐसे वरिष्ठ पत्रकार जो अधिमान्यता प्राप्त है, उन्होंने कल ऑनलाईन सेमिनार / संगोष्ठी आयोजित कर,
गैर-अधिमान्यता पत्रकारों के समर्थन में न केवल समर्थन कर आवाज बुलंद की बल्कि “अधिमान्य” के स्थान पर “सर्वमान्य” पत्रकार का नया नारा भी बुलन्द किया है ! जो पत्रकारिता जगत के लिये भविष्य में सार्थक सिद्ध होगा ? हमे यह कहने में भी संकोच नही है कि कम दिमाग वाले पत्रकारों की भी भरमार है,एक पत्रकार की अजीब मांग जानकर हैरानी होगी, जिसने पत्रकार होने का एक अलग ही वर्गीकरण किया है ? उन्होंने अपना नाम प्रदर्शित किए बिना एक इलेक्ट्रॉनिक बेनर प्रसारित किया है कि अधिमान्यता प्राप्त पत्रकारों के साथ पिछले 10 वर्षों से पत्रकारिता करने वालो को पत्रकार माना जाये ? ऐसे ही लोग तो न केवल कम दिमाग वाले है बल्कि विघ्नी भी है ! हो सकता है ऐसी अभिव्यक्ति वायरल करने वाले, ये बेचारे गत 10 वर्ष से पत्रकारिता कर रहे होंगे ? तो इनको, अपने मात्र स्वार्थ के लिये “पत्रकार” होने की यही शर्त उचित लगी ?
जबकि हमारा मत भोपाल के उन विद्वान पत्रकारों के साथ है कि पत्रकार, “अधिमान्य” नही “सर्वमान्य” होना चाहिये
जिसमे न उम्र का बंधन, न समयावधि का बंधन, न वरिष्ठता,कनिष्ठता का बंधन ! पत्रकार,पत्रकार होना चाहिये और यह तभी सम्भव है कि जब तमाम अलग -अलग संगठन आपस मे विलय कर एक सर्वमान्य पत्रकार संगठन को संचालित करें, टुकड़ो- टुकड़ो में कम -कम संख्या बल के साथ संचालित तदाकथित तमाम पत्रकार संगठन असफल साबित हुये है, इनको सिर्फ सदस्यता शुल्क ओर सदस्य संख्या से मतलब है ! हमे नही लगता कि किसी भी पत्रकार संगठन ने अपने सदस्यों को,पत्रकार होने की सरकारी पहचान “अधिमान्यता” दिलायी हो ?
ये तमाम पत्रकार संगठन,जो हजारो की संख्या में सदस्य बनाये बैठे है ? इतना भी करने में असफल रहे है कि जो फर्जी पत्रकार,जिनका पत्रकारिता से कोई लेना देना नही है, ओर जो अधिमान्यता लेकर सरकारी सुविधाओं का लाभ ले रहे है, उनकी अधिमान्यता खत्म कराने हेतु ही कुछ किया हो ? ताकि इन फर्जी अधिमान्यता वालो की कुछ संख्या कम हो तो ओर नये एक्टिव ओर सही में पत्रकारिता करने वाले लोगो को मान्यता मिले ? वर्तमान परिवेश में जरूरी हो गया है कि पत्रकारिता करने से पहले हम स्वम् को “पत्रकार” होने की पहचान का सरकारी दस्तावेजी साक्ष्य हमारे पास हो ? कौन कौन हमारे साथ है जो यह चाहता है कि अब समय आ गया है कि अधिमान्य नही, सर्वमान्य पत्रकार के लिये एकता बनाकर आवाज बुलन्द की जाये ?
सर्व पत्रकारों के हितार्थ, अभिव्यक्ति प्रसारित कर्ता :-
“सत्ता से सवाल”
बिलासपुर, छः ग
9907418774
