पखांजूर से बिप्लब कुण्डू–3.5.21

पखांजूर,प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र बड़गांव में लापरवाही थमने का नाम नही ले रही है। प्रसूता महिलाओं के नाम से शासन द्वारा प्रदत्त राशि का क्या उपयोग किया जा रहा है यह भगवान ही जाने। लेकिन मौके पर असलियत यह है प्रसूता महिलाओ को समय पर खाना उपलब्ध नही हो पा रहा है, और कभी मिल भी रहा है तो सिर्फ दाल चावल और सब्जी खिला कर उक्त राशि को खपाया जा रहा है। प्रसूता महिलाओं को मिलने वाला पौष्टिक आहार की बचत की राशि का क्या हो रहा है यह जांच का विषय है। दरअसल शनिवार को पालवी गांव से एक गर्भवती महिला को बड़गांव प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में प्रसव के लिए एडमिट किया गया, जिसको सुबह का खाना तक नसीब नही हुआ। सीधे शाम को खाना दिया गया वह भी सिर्फ चावल,दाल और एक प्रकार का सब्जी। जिसके बाद रविवार को दोपहर 12 बजे तक प्रसूता महिला भूख प्यास से तड़पती रही। लेकिन किसी ने खाने की कोई व्यवस्था नही की। और लाकडाउन के चलते बाजार बंद होने से प्रसूता के परिजन बाजार से कुछ लाने में भी असमर्थ रहे। ऐसे में स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठने लगे है।
बताना लाजमी होगा कि इस तरह की लापरवाही का यह कोई पहला मामला नही है। यह लापरवाही पिछले कई सालों से चलते आ रही है। डिलीवरी कराने आई महिलाओं को अंडा और दूध तो छोड़िए दाल-रोटी भी नसीब नहीं हो रहा है। जननी सुरक्षा योजना के अन्तर्गत प्रसूताओं को हर दिन के हिसाब से भोजन का 160 रुपये मिलता है। जिसमें उन्हें सुबह शाम चाय-नाश्ता-ब्रेड और दो समय का खाना और पौष्टिक आहार जैसे दूध, काजू, किशमिश के लड्डू, रोटी, हरि सब्जी और अन्य पौष्टिक आहार दिया जाना होता है। जिसमे 60 रुपये जीवनदीप समिति से और 100 रुपये शासकीय योजना के तहत शासन प्रदान करती है। जो कि कुल 160 रुपये का बजट एक प्रसूता महिला के लिए शासन द्वारा दिया जाता है। बजट होने के बावजूद उन्हें खाना क्यों नहीं दिया जा रहा यह समझ से परे है।
बताना लाजमी होगा कि उक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में महीने भर में करीबन 30 से 40 महिलाओं का डिलीवरी होता है। गौरतलब है कि अबतक एक ढाबे से प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में प्रसूताओं के लिए खाना जाता था और उस ढाबा संचालक को प्रति थाली का 70 रुपये के हिसाब भुगतान किया जाता था। जबकि शासन द्वारा 160 रुपये प्रदान किया जा रहा है। ऐसे में 90 रुपये किसके खाते में जाता था यह जांच का विषय है। बचत की 90 रुपये का खाना आखिर कौन खाता है और बचत की राशि किसके खाते में जाती है जांच का विषय है। ढाबा संचालक को 160 रुपये देने के बजाय 70 रुपये का भुगतान 178 थाली का किया गया। जिसमे भी आरएमओ द्वारा बिल भुगतान कराने के एवज में दो हजार रुपये की मांग की गई थी। ढाबा संचालक द्वारा नही देंने के चलते आरएमओ ने ढाबा से खाना बंद करा दिया और एक समूह को इसकी जिम्मेदारी दी दी गई।
जानकारी होने के बावजूद जिम्मेदार ने नही लिया संज्ञान-
गौरतलब है कि इस पुरे मामले की जानकारी कोयलीबेड़ा खण्ड चिकित्सा अधिकारी को मीडिया के माध्यम से दी गई थी। प्रमुखता से खबर भी प्रकाशित की गई थी। बावजूद विभाग के आला अफसरों ने न तो इस मामले को गंभीरता से लिया और न ही दो हजार रुपये रिश्वत मांगने वाले आरएमओ से पूछताछ हुई और न ही कोई जांच हुआ। जिसका खामियाजा आज लाकडाउन में प्रसूताओं को उठाना पड़ रहा है। प्रसव कराने आये महिला को भूखे प्यासे रखना मानवता को झकजोर देने वाला वाकया है। ऐसे में इस मामले को अधिकारी कितनी गम्भीरता से लेते है यह वक्त ही बताएगा।
डॉक्टर जेएल उइके, सीएचएमओ- बीएमओ से बात करता हुँ, लापरवाही बर्दाश्त नही की जाएगी। प्रसूता महिलाओं को लेकर क्यों इतनी लापरवाही बरती जा रही है जानकारी लेता हूं। प्रसूता महिलाओं को पौष्टिक आहार दिया जाने का प्रावधान है जिसके लिए शासन द्वारा योजनाएं क्रियान्वित कर राशि भी दी जा रही है फिर भी लापरवाही क्यों हो रही है जानकारी लेता हूं।
