उसूर–पेरमपल्ली सड़क बनी “प्रयोगशाला”
केमिकल–सीमेंट छिड़काव वाली मरम्मत पर व्यंग्य, गुणवत्ता, कथित कमीशनखोरी और जांच प्रक्रिया पर भी उठी चिंता
ईश्वर सोनी बीजापुर
बीजापुर – उसूर से पेरमपल्ली जाने वाली प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY) के अंतर्गत बनी सड़क इन दिनों अपने अनोखे “मेंटेनेंस मॉडल” को लेकर चर्चा में है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यहां पारंपरिक तरीके से गड्ढे भरने या सड़क की परत मजबूत करने के बजाय केमिकल डालकर उसके ऊपर सीमेंट का छिड़काव किया जा रहा है और इसे ही मेंटेनेंस बताया जा रहा है। इस पद्धति को लेकर ग्रामीण व्यंग्य कर रहे हैं कि मानो सड़क नहीं, कोई इंजीनियरिंग प्रयोग चल रहा हो।
इसी बीच, जिले में PMGSY के तहत 1000 करोड़ रुपये से अधिक लागत के सड़क निर्माण और मरम्मत कार्यों को लेकर भी गंभीर सवाल उठने लगे हैं। गुणवत्ता, निर्माण सामग्री और विभागीय स्तर पर कथित कमीशनखोरी की चर्चाओं ने पूरे मामले को और संवेदनशील बना दिया है।
*“सीमेंट छिड़काव” से चमक, पर मजबूती पर सवाल*
ग्रामीणों के अनुसार, सड़क पर पहले किसी रासायनिक पदार्थ का उपयोग किया जाता है, फिर ऊपर से सीमेंट छिड़क दिया जाता है। कुछ समय तक सड़क चमकदार दिखती है, लेकिन यह सुधार अस्थायी साबित होता है। लोगों का कहना है कि न तो गड्ढों की ठोस मरम्मत होती है और न ही सड़क की वास्तविक मजबूती बढ़ती है।
दोपहिया वाहन चालकों के लिए यह स्थिति जोखिम भरी बताई जा रही है, क्योंकि कई स्थानों पर फिसलन और उखड़े हुए हिस्सों की शिकायतें हैं।
*PMGSY की सड़को एंव पुलिया निर्माण की गुणवत्ता पर उठ रहा बड़ा प्रश्नचिन्ह*
ग्रामीणों और स्थानीय सूत्रों का आरोप है कि जिले में चल रहे PMGSY कार्यों में गुणवत्ता मानकों की अनदेखी हो रही है। चर्चाओं के मुताबिक, जहां मानक के अनुसार उच्च गुणवत्ता की सीमेंट के बदले निम्न स्तर की सीमेंट और 20 मिमी व 40 मिमी गिट्टी का उपयोग अपेक्षित है, वहां अपेक्षाकृत सस्ती सामग्री लगाए जाने की शिकायतें मिल रही हैं। कुछ स्थानों पर गिट्टी के बजाय नालों से निकले पत्थरों के उपयोग की भी बात कही जा रही है।
लोगों का कहना है कि इससे सड़कों और पुलियों की टिकाऊ क्षमता प्रभावित हो सकती है।
*PMGSY में कथित कमीशनखोरी की चर्चाएं जोरो पर*
स्थानीय स्तर पर यह भी चर्चा है कि तकनीकी स्वीकृति से लेकर बिल भुगतान तक की प्रक्रिया में कथित रूप से कमीशन का दबाव रहता है। कुछ ठेकेदारों ने अनौपचारिक बातचीत में दावा किया कि प्रति किलोमीटर राशि तय होने की बात कही जाती है, जबकि पुलिया निर्माण का अलग हिसाब बताया जाता है। हालांकि इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हो सकी है।
*NQM एंव SQM टीम की जांच प्रक्रिया पर भी उठने लगे सवाल*
स्थानीय लोगों और कुछ सूत्रों ने यह भी आरोप लगाया है कि सड़कों की गुणवत्ता जांच के लिए आने वाली SQM (स्टेट क्वालिटी मॉनिटर) और NQM (नेशनल क्वालिटी मॉनिटर) टीमों की कार्यप्रणाली पूरी तरह पारदर्शी नहीं है। उनका दावा है कि कई बार जमीनी स्तर पर विस्तृत तकनीकी जांच के बजाय औपचारिकता पूरी कर रिपोर्ट तैयार कर दी जाती है।
चर्चाओं में यह भी कहा जा रहा है कि निरीक्षण के दौरान कथित रूप से अनुचित आतिथ्य और अन्य लाभ दिए जाने की बातें सामने आती हैं, जिससे जांच की निष्पक्षता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो सकी है।
कागजों में प्रगति, जमीन पर असंतोष
योजना के तहत कार्यों की प्रगति रिपोर्ट भले संतोषजनक दिखाई जा रही हो, लेकिन जमीनी हालात को लेकर ग्रामीणों में असंतोष है। उनका कहना है कि यदि निर्माण और मरम्मत केवल दिखावटी रहे, तो सड़कें जल्दी खराब होंगी और भविष्य में फिर सरकारी धन खर्च करना पड़ेगा।
*ग्रामीणों ने जांच की मांग*
स्थानीय नागरिकों और कुछ जनप्रतिनिधियों ने पूरे मामले की तकनीकी और वित्तीय जांच की मांग की है। उनका कहना है कि सार्वजनिक धन से बन रही सड़कों में पारदर्शिता और गुणवत्ता सुनिश्चित करना आवश्यक है।
विभागीय अधिकारियों और संबंधित गुणवत्ता मॉनिटरिंग एजेंसियों से प्रतिक्रिया लेने का प्रयास किया गया, लेकिन समाचार लिखे जाने तक उनका आधिकारिक पक्ष सामने नहीं आ सका।
यह मामला अब केवल एक सड़क या एक मरम्मत पद्धति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि ग्रामीण विकास योजनाओं की गुणवत्ता, पारदर्शिता और जवाबदेही से जुड़ा बड़ा प्रश्न बनता जा रहा है।
*मुख्य ठेकेदार नदारद, पेटी कॉन्ट्रैक्ट में हो रहा निर्माण?*
स्थानीय स्तर पर यह आरोप भी सामने आ रहे हैं कि कई सड़क कार्यों में टेंडर लेने वाले मुख्य ठेकेदार मौके पर दिखाई ही नहीं देते, जबकि वास्तविक निर्माण कार्य कथित रूप से पेटी (सब-कॉन्ट्रैक्ट) के माध्यम से कराया जा रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि जब जिम्मेदार मूल ठेकेदार ही स्थल पर सक्रिय नहीं रहता, तो कार्य की गुणवत्ता की निगरानी और जवाबदेही दोनों प्रभावित होती हैं।
सूत्रों के अनुसार, पेटी कॉन्ट्रैक्ट व्यवस्था में काम अक्सर कम दरों पर आगे दे दिया जाता है, जिससे निर्माण सामग्री और तकनीकी मानकों में समझौते की आशंका बढ़ जाती है। लोगों का सवाल है कि यदि कार्य कई स्तरों से होकर गुजर रहा है, तो गुणवत्ता नियंत्रण आखिर किस स्तर पर सुनिश्चित किया जा रहा है।
