*साँची-सुरभि*
*नवगीत ( 16 – 15 )*
*इमारतों में सिमटे लोग*

झोपड़ियाँ हैं गीली गीली
इमारतों में सिमटे लोग ।
अंधानुकरण सब पर हावी ,
बने विलासी डूबे भोग ।।

मौसम ने भी करवट ली है ,
मेघ गर्जना है कमजोर ।
रजनी मलिन हुई है भारी ,
नहीं सुहानी लगती भोर ।
अब बदला रूप प्रकृति ने भी ,
व्याप्त सभी पर कैसा रोग ।
झोपड़ियाँ हैं गीली गीली
इमारतों में सिमटे लोग ।।

ताप तपित धरती अति व्याकुल ,
शुष्क हुई नदिया जलधार ।
मानव कर्मों के मूल्यों को ,
चुका रहा सारा संसार ।
सिमट रही गाँवों की गलियाँ ,
विस्तारित है शहर प्रयोग ।
झोपड़ियाँ हैं गीली गीली
इमारतों में सिमटे लोग ।।

धरती में पग धरे नहीं ये ,
आसमान की करते सैर ।
स्वार्थ लोभ में घिरे हुए जन ,
कर बैठे अपनों से बैर ।
जिम जाकर कसरत सब करते ,
छोड़े करना उत्तम योग ।
झोपड़ियाँ हैं गीली गीली
इमारतों में सिमटे लोग ।।

बड़े बुजुर्गों का संग छोड़ ,
भूले सब अपने संस्कार ।
अंधी दौड़ लगाता मानव ,
धन का पुतला है लाचार ।
स्वार्थ स्वयं का सर्वोपरि कर ,
करे मनुज साधन उपयोग ।
झोपड़ियाँ हैं गीली गीली
इमारतों में सिमटे लोग ।।

*इन्द्राणी साहू”साँची”*
भाटापारा (छत्तीसगढ़)