बोर्ड परीक्षाओं में ऐतिहासिक सफलता पर ‘प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के ’मन की बात’ में हुआ दंतेवाड़ा का उल्लेख।

दूरस्थ और नक्सल प्रभावित जिला ने रचा शैक्षणिक इतिहास।

दंतेवाड़ा – दंतेवाड़ा की धरती ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि अगर संकल्प और रणनीति सशक्त हो, तो सबसे कठिन परिस्थितियों में भी शिक्षा की रोशनी फैल सकती है। आज माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने अपने प्रसिद्ध रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ के 122वें संस्करण में दंतेवाड़ा जिले की बोर्ड परीक्षाओं में हुई अभूतपूर्व सफलता का विशेष उल्लेख करते हुए कहा कि यह जिला अब संघर्ष नहीं, बल्कि शैक्षणिक सफलता की नई मिसाल बन रहा है।वास्तव में, दंतेवाड़ा का यह परिवर्तन एक साधारण उपलब्धि नहीं, बल्कि दशकों के पिछड़ेपन, माओवादी हिंसा और संसाधनों की कमी के बीच शिक्षा को केंद्र में रखकर की गई एक सुनियोजित क्रांति है। जहां कभी विद्यालय जाने से पहले सुरक्षा की चिंता होती थी, आज वही गांव राज्य स्तर पर बोर्ड परीक्षा में टॉपर्स दे रहे हैं।

‘पढ़े दंतेवाड़ा, लिखे दंतेवाड़ा’ टेस्ट सीरीज़ बनी सफलता की रीढ़

इस परिवर्तन का केंद्र रहा “पढ़े दंतेवाड़ा, लिखे दंतेवाड़ा” नामक अभिनव शैक्षणिक अभियान, जो अगस्त 2023 से जिले के सभी शासकीय उच्च एवं उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों में कक्षा 9वीं से 12वीं के छात्रों के लिए संचालित किया गया। इस पहल के अंतर्गत नियमित यूनिट टेस्ट, त्रैमासिक, अर्धवार्षिक, प्री-बोर्ड और मॉक बोर्ड परीक्षाएं आयोजित की गईं। प्रश्नपत्रों को शिक्षकों के पीयर लर्निंग सर्कल (PLC) के माध्यम से तैयार किया गया, जिससे गुणवत्ता और मानकीकरण सुनिश्चित हुआ।उत्तर पुस्तिकाओं की निष्पक्ष जांच के लिए इंटर-स्कूल मूल्यांकन व्यवस्था लागू की गई, जिससे शिक्षक भी एक-दूसरे से सीख सके और छात्रों की निष्पक्ष मूल्यांकन हो सके। हर छात्र की प्रगति को डिजिटल रूप से ट्रैक किया गया और कमजोर विद्यार्थियों के लिए पूर्व और पश्चात कक्षा में अतिरिक्त कक्षाएं, तथा तेज छात्रों के लिए मेरिट सपोर्ट सत्र आयोजित किए गए। जनवरी से मार्च तक सभी छात्रों को मॉडल प्रश्न पत्र और उत्तर सहित अभ्यास सामग्री भी वितरित की गई।

बोर्ड परीक्षा में राज्य स्तर पर ऐतिहासिक प्रदर्शन

इन ठोस प्रयासों का परिणाम सामने आया जब दंतेवाड़ा जिले ने 2024 की 10वीं बोर्ड परीक्षा में 94.45% के साथ पूरे राज्य में प्रथम स्थान प्राप्त किया। वहीं 12वीं परीक्षा में जिले की रैंकिंग 11वें से बढ़कर 6ठे स्थान पर पहुंची, और सफलता दर 87.66% रही। यह मात्र आंकड़े नहीं हैं, यह उस सामूहिक परिश्रम और दूरदर्शी योजना का परिणाम है जिसने इस नक्सल प्रभावित जिले को राज्य का शैक्षणिक उदाहरण बना दिया।

स्थानीय चुनौतियों का स्थानीय समाधान

जहां शिक्षकों की कमी थी, वहां शिक्षा समर्थन योजना के तहत स्थानीय स्नातकों को अतिथि शिक्षक के रूप में जोड़ा गया। जहां छात्र स्कूल छोड़ रहे थे, वहां बाला मित्रों ने घर-घर जाकर संवाद किया और बच्चों को पुनः विद्यालय से जोड़ा। जहां सुरक्षा की समस्या थी, वहां पोटा केबिन स्कूलों का विस्तार कक्षा 12वीं तक किया गया और प्रत्येक विद्यालय को पास के आवासीय केंद्र से जोड़ा गया। परिणामस्वरूप, कक्षा 9वीं से 12वीं के 70% से अधिक छात्र अब सुरक्षित आवासीय सुविधा में रहकर अध्ययन कर रहे हैं।

मनःस्थिति पर भी रहा फोकस

बोर्ड परीक्षाओं की तैयारी के दौरान छात्रों में आत्मविश्वास बनाए रखना एक बड़ी चुनौती थी। इस दिशा में जिला प्रशासन द्वारा उत्तर लेखन कौशल, परीक्षा रणनीति, और समय प्रबंधन पर कार्यशालाएं आयोजित की गईं। इसके साथ ही, कुछ स्वयंसेवी संस्थाओं के सहयोग से विद्यार्थियों के लिए प्रेरणात्मक सत्र और मानसिक तैयारी हेतु सहयोगात्मक गतिविधियाँ आयोजित की गईं, जिससे विद्यार्थियों का आत्मबल बढ़ा।

करियर मार्गदर्शन और समुदाय की भागीदारी बनी प्रेरक शक्ति

हर विद्यालय में करियर मेंटर शिक्षक नियुक्त किए गए, जिन्होंने नियमित रूप से छात्रों को भविष्य की पढ़ाई और करियर विकल्पों के बारे में मार्गदर्शन दिया। जिले में आयोजित करियर मेला में विशेषज्ञों ने छात्रों से सीधे संवाद किया। साथ ही, पंचायत स्तर पर छात्रों की सार्वजनिक सराहना की गई, जिससे सामुदायिक भागीदारी और छात्रों में गौरव की भावना मजबूत हुई।

राष्ट्रीय मंच से मिला यह सम्मान बना नई ऊर्जा का स्रोत

प्रधानमंत्री द्वारा “मन की बात” में किया गया यह उल्लेख, न केवल इस उपलब्धि को राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता देने वाला है, बल्कि यह इस बात का प्रमाण भी है कि स्थानीय प्रयास, प्रतिबद्ध शिक्षक, सजग प्रशासन और जागरूक समुदाय मिलकर किसी भी चुनौती को अवसर में बदल सकते हैं।यह सफलता केवल परीक्षा पास करने की नहीं, बल्कि आत्मविश्वास, समुदाय में विश्वास और शिक्षा के प्रति नवजागरण की कहानी है। दंतेवाड़ा ने दिखा दिया है कि बंदूक की जगह जब कलम थामी जाती है, तो परिणाम सिर्फ अंक नहीं, बदलाव बन जाते हैं।यह सिर्फ परीक्षा की नहीं, पहचान की जीत है।