आदिवासी ग्रामीण लॉकडाउन की तर्ज पर सालों कर रहे है गुजर बसर…

कोरोना महामारी से आज भी अछूता आदिवासी परिवार

सीमित संसाधनों में करते है गुजरा

पखांजूर से बिप्लब कुण्डू-26.4.21- कोरोनाहामारी के चलते लॉकडाउन की तस्वीरें और पाबंदियां हर इंसान को परेशान कर देती है लोगों की जिन्दगी बचाने के लिए नजरबंद करना सरकार की मजबूरी बन चुकी है….हर तरफ मौत का वो खौफनाक मंजर अपनों हमेशा के लिये विदा करना मुश्किल हो गया है ऐसे मंजारों के बीच कांकेर जिला में एक ऐसा भी गाँव है जो एक दो महीनों से नहीं बीते कई सालों से लॉकडाउन के तर्ज पर गुजर बसर करते आ रहा है ।
उनके आवश्कताओं इतनी सीमित है की भौतिक सुख सुविधाओं की दुनिया से कोसों दूर रहते हुए इन अशिक्षति आदिवासियों ने पुरी दुनिया को ये संदेश देने की कोशिश की है की जीने के लिए ज्यादा चीजों की जरूरत नहीं होती समिति संसाधनों में रहकर भी बेशकीमती ज़िन्दगी को बचाई जा सकती है….इन दिनों पूरा देश वैश्विक महामारी के दौर से गुजर रहा है रोजाना महामारी से हो रही मौत के आंकड़ों ने ऐसा हालत कर दिया है की मौत के आंकडे सुनकर ही रूह काँप उठ रही है….प्रदेश में भी कोरोना महामारी से रोजना मौत के आंकड़े बढ़ते जा रहे है जिसे रोकने लिए पूरा प्रदेश में लॉकडाउन करना एक मजबूरी बन चुकी है….महामारी के दौर में कांकेर जिले का सराईपानी गाँव ने वो मिशाल दिया है की जो कोरोना महामारी से पुरी तरह अछूता है और हम ये दुआ भी करते भी है की ये गाँव महामारी से अछूता ही रहे….सालों से लॉकडाउन की तर्ज गुजर बसर कर रहे है सराईपानी गाँव के 17 आदिवासी ग्रामीण परिवार हजारों फीट पहाडियों गहरे खाई में निवास कर गुजर बसर कर रहे है सरकारी सुविधाओं के नाम पर पानी के नाम पर एक कतरा पानी तक उन्हें नसीब नहीं फिर भी आदिवासी ग्रामीण परिवारों ने कभी किसी सरकार से एक फरियाद तक नहीं की उन्हें बिजली पानी सडक मुहैया कराए क्योंकि उनके आवश्कताएँ इतने सीमित है की वे खुद ना तो जंगलों बाहर निकलते है और ना ही कोई बाहरी व्यक्ति वहां तक आसानी से पहुचने की हिम्मत जुटा पाता है उन तक पह्चुने के लिए भी लगभग 12 किमी में तीन पहाड़ियों को पार कर ही पहुचना सम्भव है ।
वे महीनों में ही एकदा बार ही दो दिन का सफर कर नमक मिर्च लेने हाट बाजार आते है….शेष आवश्कतायें वे जंगलों से ही पूरा कर लेते है…..वे इस त्रासदी के दौर में भी बिना किसी मास्क और सेनेटाईजर के खुद को जंगलों में लॉकडाउन कर बेफिक्र की जिन्दगी जी इस महामारी में भी सुरक्षित है जो इस आधुनिकता दुनिया में एक अजीब बात है….जंगलों में लॉकडाउन के तर्ज गुजर बसर कर रहे आदिवासी ग्रामीण परिवार बताते है की उनके इस गाँव में कोरोना का कोई प्रकोप नहीं है वे ना तो मास्क का उपयोग करते है और ना किसी सेनेटाइजर का नाम सूना है….वे इस जंगलों के वनोपज पर पुरी तरह निर्भर है उनके घरें लकड़ी और घास फूस से बने है पानी के लिए एक गड्ढानुमा तालाब उन्होंने ने ही बनाया है….यदि कोई ग्रामीण कभी सर्दी खांसी मलेरिया से ग्रसित हो भी जाए तो जडी-बुटी से वे अपना इलाज खुद कर लेते है….वे अनपढ़ होकर ये कहते बातें कहते जो लोग बेवजह घरों से निकलकर बाहर घूमते है वे ही इस बीमारी के चपेट में आ रहे है….कोरोना महामारी से लोगों की ज़िन्दगी बचाने के लिए किये गये लॉकडाउन शायद भौतिकतावादी लोगों के लिए परेशानी का सबब हो सकता है….लेकिन सीमित संसाधनों में सालों से लॉकडाउन के तर्ज पर जंगलों में गुजर बसर कर आदिवासी परिवार इस महामारी में एक मिशाल साबित हुए है ।