लघुकथा:
शुरुआत/महेश राजा/
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रामू रिक्शा चलाता था। उसका इकलौता लड़का पास के ही जनपद स्कूल मे पढ़ता था। रामू सोचता था कि उसका लड़का पढ़ लिखकर कुछ बन जाये तो जिस तकलीफ से वह गुजरा है, उससे बच जाये। यही सोच कर वह मास्टर जी के बच्चों को कभी-कभार बगीचे तक मुफ्त की सैर करा लाता था ताकि मास्टर जी बच्चे का पढ़ाई में ध्यान रखेंगे।
आज रामू घर लौटा तो पाया कि उसका लड़का रो रहा है। पूछने पर सिसकते हुए उसने बताया कि गुरुजी ने आज उसे छड़ी से खूब मारा है।
रामू ने पूछा, “तूने कोई गल्ती की होगी?”
बच्चा सिसकता हुआ बोला, “नहीं बाबू, किसी शरारती लड़के ने मास्टर जी की टेबल पर मेंढ़क रख दिया था और नाम मेरा ले दिया।”
रामू ने बच्चे को गले से लगा कर चुप कराया और कहा, “मार के डर से पढ़ना छोड़ देगा क्या? तुझे भी मेरी तरह रिक्शा ही खींँचना है क्या? हमारे जमाने मे तो गुरू जी बहुत मार मारते थे। मैंने ड़र कर स्कूल जाना छोड़ दिया तो देख लो रिक्शा ही चला रहा हूँ।”
लड़के को समझा कर जैसे ही रामु रिक्शा लेकर निकला। सड़क तक पहुंचा ही था कि पीछे से कोई आवाज आई। मुड़कर देखा तो मास्टर जी का लडका राजू था, “ऐ रिक्शा…। बाजार तक चलना है।”
रामू ने राजू की तरफ देखा। उसे लड़के का रोता हुआ चेहरा याद आ गया। गुरू जी ने अकारण उसके लड़के को पीटा था।
उसने तेजी से रिक्शा आगे बढ़ा दिया।
*महेश राजा*
महासमुंद।छतीसगढ।
*9425201544*
