ऋषियों ने संसार को नहीं खोजा ,स्वयं की खोज में लगे रहे यही गीता ज्ञान है – ब्रह्माकुमारी भारती दीदी।

नवापारा ,राजिम – एक ही परिवार में जीवन मरण का प्रश्न हो, हृदय में मोह व घृणा हो , भय व आक्रोश के भाव एक साथ पैदा हो रहे हो ऐसे में स्वयं भगवानशिव प्रत्येक आत्मा अर्जुन के हृदय में ज्ञान कर्म भक्ति की दिव्य धारा प्रवाहित कर अमर संदेश संप्रेषित कर रहे हैं। यही भगवत गीता का उपदेश का महत्व स्थाई चिरंतन है। संसार के जितने विद्वान ,आचार्य ,मनीषी पैदा हुए उन्होंने संसार व आकाश को नहीं खोज बल्कि मैं कौन हूं उसकी खोज की। स्वयं की खोज में लग रहे। संसार के लोगों के बीच में रहकर असाधारण जीवन कैसा बनाया। आज मानव चंद्रमा तक पहुंच गया लेकिन चंद्रमा जैसी शीतलता नहीं आई, जब तक स्वयं को नहीं जाना तब तक मंगल कुशल जीवन नहीं हो सकता ।जिसने स्वयं को पहचान लिया वह संसार से आगे निकल गया। स्वयं को नहीं जाना तब तक जीवन व्यर्थ है ।वास्तव में हम कौन हैं ।आत्मा है। आंखों से देखने वाले कौन है ।गीता के आठवें अध्याय में कहा गया अंत समय दोनों भौंहों के बीच में आत्मा समझ के भगवान को याद करते हैं उन्हें स्वर्ग की प्राप्ति होती है। मस्तक के बीच चमकता अजब सितारा अपने को अनुभव करना है जिसने जन्म लिया, मृत्यु निश्चित है। यह विचार राधा कृष्ण मंदिर में आयोजित श्रीमद् भागवत गीता महायज्ञ में कटनी से पधारी राजयोगिनी ब्रह्माकुमारी भारती दीदी ने नगर वासियों को भागवत कथा के दूसरे दिन के अवसर पर बताया । जिसने जन्म लिया मृत्यु निश्चित है। यहां कोई रहने वाला नहीं ।आत्मबोध नहीं होने के कारण दुखी हो जाते हैं। हर मानव की बाल ,युवा, वृद्ध अवस्था शरीर की होती है। जन्म उत्सव वृद्धा उत्सव मनाते हैं उसमें रोते नहीं है ।हम शरीर के मोह में इतने आ चुके हैं इसके कारण दुखी होते हैं ।राजा जनक आत्मबोध से राजमहल में रहते संयासी बन गए ।राजा जनक को विदेही क्यों कहा गया। राजमहल में रहते उन्होंने आत्म दीपक को जगाए रखा,कि राजमहल में रहते आत्म दीपक कहीं बुझ न जाए यही विधि है घर ग्रहस्थ में रहते कि मेरे से कोई पाप कर्म नहीं हो जाए ,किसी को दुख नहीं मिल जाए । जिसने मन को कंट्रोल कर लिया वही सच्चा सन्यासी है। संसार में रहना है लेकिन मन में संसार नहीं हो, संसार में लिप्त नहीं हो जाए ।आत्मा अनुभूति बहुत जरूरी है । विनाशी चीजों को एकत्रित करने में नहीं आई हूं ।ऐसे स्वचिंतन करना है ।वास्तव में मैं आपको देख रही हूं या आंखों से मैं देख रही हूं। आत्मा का ध्यान परमात्मा में जाएगा तो श्रेष्ठ बन जाएगी। भावना से सत्कर्म करो। जाने से पहले सत्कर्म करने पड़ेंगे। मक्खन से बाल ऐसे शरीर छोड़ेंगे अंतिम अवस्था को ठीक करना है ।सत्कर्म करने से दृढ़ संकल्प करना है कि मुझे खुशी-खुशी से भगवान के घर जाना है ।कार्यक्रम के अंत मेंसभी नगर वासियों ने गीता मां की आरती की और सभी ने प्रसाद ग्रहण किया। प्रत्येक दिन प्रात 6 से 7:00 बजे म्यूजिकल एक्सरसाइज ब मेडिटेशन का अभ्यास कराया जा रहा है।