भूपेन्द्र सिन्हा

छुरा:- गरियाबंद जिला में दीपावली के आते ही बच्चों के द्वारा जगह जगह सुआ नृत्य किया जा रहा है,वहीं गरियाबंद जिले के छुरा, ब्लॉक के सारागांव के बच्चों द्वारा जगह-जगह सुआ नित्य किया जा रहा है। यह दीपावली के पर्व पर महिलाओं द्वारा गाया जाने वाला गीत है ।इस लोकगीत में स्त्रियां तोते के माध्यम से संदेश देते हुए गीत गाती हैं। इस गीत के जरिए स्त्रियां अपने मन की बात बताती हैं, इस विश्वास के साथ कि वह (सुवा) व्यथा उनके प्रिय तक पहुँचायेगा। इसका उपयोग गौरा-गौरी के विवाह उत्सव में करती हैं इस नृत्य की दूसरी मान्यता यह है कि सुआ नृत्य की शुरुआत दीपावली के दिन से की जाती है, और ऐसा माना जाता है कि पूर्व में दीपावली तक किसानों के खेतों में से धान की फसल कट जाया करते थे,यह नृत्य, छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान का अहम हिस्सा है।

सुआ नृत्य को तोता नृत्य भी कहा जाता है,यह नृत्य, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश दोनों राज्यों से जुड़ा है,सुआ नृत्य में महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में सजती हैं और अपने सिर पर घुंघरू बांधती हैं,सुआ नृत्य में, महिलाएं नर्तक एक तोते को बांस के बर्तन में रखती हैं और उसके चारों ओर एक चक्र बनाती हैं,सुआ नृत्य के दौरान गाए जाने वाले गीतों में जीवन की कठिनाइयों, प्रेम, विरह, और धार्मिक मान्यताओं की भावनाओं का वर्णन होता है। सुआ नृत्य की शुरुआत आमतौर पर शाम को होती है,सुआ नृत्य, दिवाली के अलावा छत्तीसगढ़ के कई सांस्कृतिक उत्सवों और कार्यक्रमों में किया जाता है,सुआ नृत्य की मान्यता है कि सुआ गीत नृत्य करने वाली महिलाएं गांव में किसानों के घर-घर जाती थीं और उन्हें उपहार स्वरूप पैसे या अनाज दिया जाता था।

