कंसारी समाज महिला संगठन नवापारा की सर्वसम्मति से अध्यक्ष बनीं सरोज कंसारी।

नवापारा राजिम – नर और नारी से सृजित इस संसार में एक के बिना दूजे का कोई अस्तित्व नहीं होता ।कहते भी हैं _यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवता ।जहां नारी का सम्मान होता हैं वहीं देवता का वास होता हैं ।कंसारी समाज ने नारी को आत्म निर्भर बनानें ,उनके मनोबल को बढ़ाने और कदम से कदम मिलाकर इस पुरुष प्रधान समाज के साथ चलने के लिए सदैव प्रयासरत रहें। उनके इस सकारात्मक सोच का ही परिणाम हैं की कंसारी समाज में महिला आज जागरुक ,सक्रिय और संगठित हैं।सत्यनारायण मंदिर के प्रांगण में छह पार की महिलाओं की उपस्थिति में हर पार से एक प्रतिनिधि का चयन कर ,लोकतांत्रिक पद्धति से महिला अध्यक्ष पद के लिए चुनाव किया गया। जिसमें सबसे अधिक वोट से कंसारी समाज महिला संगठन के अध्यक्ष पद के लिए नगर की कवयित्री लेखिका और मंच संचालिका सरोज कंसारी चयनित हुई। किसी भी व्यक्ति के संपूर्ण व्यक्तित्व के विकास के लिए योग्य नेतृत्व की महत्वपूर्ण भूमिका होती हैं ।सामाजिक विषयों पर चिंतन,आवश्यक निर्णय, समस्या _समाधान के लिए समाज में महिलाओं का योगदान बेहद ज़रूरी हैं ।समाज से ही हर इंसान को नई पहचान मिलती हैं।मातृ शक्तियों ने पुष्प हार पहनाकर तिलक वंदन कर सरोज कंसारी का हार्दिक अभिनंदन किया।

    इस अवसर पर सरोज कंसारी ने कंसारी समाज और समस्त नारी शक्ति का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि_ आप सभी ने मुझे सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी दी हैं ।आपके इस प्यार, सम्मान और विश्वास को बनाएं रखतें हुए, आप सभी के सहयोग से हमेशा समाज के हित में ही कार्य कर, महिलाओं के सतत विकास के लिए अग्रणी रहूंगी। बचपन से लेकर बुढ़ापे तक संघर्ष करती हैं नारी ,लेकिन जो कभी हार नहीं मानती और हर मुश्किलों का सामना करने को तैयार होती हैं, वह सही मायने में मातृशक्ति कहलाती हैं ।रिश्तों की दुनिया में अपने वजूद को ढूंढते हुए वह कभी तो माता_पिता, भाई-बहिन के लिए समर्पित होती हैं,तो वहीं एक बहू, मां ,पत्नी और सास बनकर परिवार की केंद्र बिंदु बनती हैं। जिसके सूझबूझ सहनशीलता,साहस और सेवाभाव से एक परिवार स्वर्ग बनता है। स्त्री बिखरे,उलझे हुए और टूटे परिवार को अपने स्नेह ,प्रेम और ममता से जोड़ देती हैं ।अपनी मधुर, सौम्य और शालीन व्यवहार से कठोर हृदय को भी जीत लेती हैं, वो सच में देवी तुल्य होती हैं। घर की साक्षात् लक्ष्मी,सरस्वती और दुर्गा होती हैं। इतना आसान नहीं होता एक बेटी से बहू तक का सफ़र तय करना ।लोगो को खुश करने और दिलो में जगह बनाने में जिंदगी गुजर जाती हैं ।लेकिन जो संघर्ष की भट्टी में तपकर आगे बढ़ती हैं वहीं स्त्री कुंदन बन निखरती है और उसे हर किसी से प्यार दुलार मिलता ही हैं ।मेहनत करती हुई स्त्री बहुत ही सुंदर लगती हैं , उनकी पसीने की हर बूंद से उसका सौन्दर्य निखरता हैं ।जो कभी धूमिल नहीं होता। आंखो में दर्द की दास्तां होती हैं ,जुबां मौन ,मन में अनंत ख्वाहिश ,पर अनवरत चलती हैं कर्म और फर्ज की राह पर। संयम और मर्यादाओं से सुसज्जित स्त्री पूरे हिन्दुस्तान की पहचान होती होती हैं। ऐसी कर्मठ और कुछ कर गुजरने की चाह रखने वाली महिलाओं को आज एकता के सूत्र में बांधने का कार्य समाज ने किया हैं। जिसके हम सदा ही आभारी रहेगें।

आज कंसारी समाज की महिलाएं अपने परिवार के साथ ही समाज के उत्थान के लिए संकल्पित हैं। जिन्हें मैं सादर नमन करती हूं। उनकी इस उपलब्धि पर महिला संगठन से संतोष ,विलासिनी, हर्षा, सुनीता, विमला, माया, धर्मीन ,पुष्पा ,कल्याणी, प्रीति, पद्मा, लीला ,पार्वती, कौशल्या, हीरा,पूजा,अनिता, द्रोपदी,मीना, सावित्री,पद्मिनी, ननकी, रेणु, सुषमा, सुलोचना उषा, गायत्री,सीता, रूपाली, तुलसी , रेखा, प्रमिला , रेखा,रंभा, रति , गंगा, रूखमणी , मंदाकिनी, अर्चना, अमिता, पूजा, जया कंसारी मुन्ना साव, राजकुमार कंसारी, बाबूलाल, बलराम सारस,राजकुमार कंसारी(लोटा )बबला सारस ,रामा साव, कलिदान कंसारी, नंद कुमार कंसारी,संतोष कंसारी, राजू(लोदु साव),गोपाल कंसारी गुरुजी, गणेश ,गोविदा कंसारी, नागेंद्र, देवेंद्र, दीपक,कन्हैया, सुनील साव, रमेश ,कमलेश, जनक, दिलीप, मुकेश,वीरेंद्र ,अनिल, मनोज , कार्तिक,पवन,राजेश कंसारी, रमेश मोंटी,मुन्ना कंसारी, तुकाराम, तरुण , ज्ञानचंद , विजय,प्रमेंद्र कंसारी आदि सभी सामाजिक बंधुओ ने हार्दिक बधाई दी ।एवम इनके उज्ज्वल भविष्य की कामना किए ।