प्रमोद दुबे
महासमुंद:-छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले का खल्लारी मातेशवरी मंदिर जन विख्यात है वाह क्वार और चैत्र में भव्य नवरात्र पर्व का आयोजन किया जाता है मनोकामना की पूर्ति व ज्योति कलश की स्थापना के लिए दूर-दूर से श्रद्धालू यहां पहुंचते हैं! ग्राम खल्लारी को पुरातनकाल मैं मृतकागढ के का नाम से जाना जाता था फीर बाद में से खल्लवाटिका के नाम से जान गया है किंतू अब यह स्थान ग्राम खल्लारी के नाम से प्रसिद्ध है! रायपुर से खल्लारी की दुरी मात्र 75किलोमीटर है! यहां पहुंचने के लिए सब तरह से साधन उपलब्ध है! यहां स्थान राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक-353 में महासमुंद और बागबाहरा के मध्य सड़क मार्ग से महज 2 किलोमीटर की दूरी पर है जो खल्लारी मुख्य सड़क व और रेल मार्ग से जुड़ा है यहा खल्लारी मातेश्वरी का दो प्रमुख मंदिर है ! पहला मंदिर गाँव के पहाड़ी और दूसरा मंदिर यहाँ गाँव में ही है! खल्लारी का तत्पर्य खल और अरि अर्थात शत्रुओं का नाश करने वाली है! जो असांख्य श्रद्धालूओं की आस्था और श्रद्धा का केंद्र बन चुका है यहां प्रतिदिन हजारों की संख्या में माता के दर्शन के लिए श्रद्धालू पहुंचते हैं खल्लारी मातेश्वरी पहाड़ हरे भरे वृक्ष वी लताओं से आच्छादित 355 ऊंची सुरम्ब पहाड़ी पर है जिसकी मनोहरी दृश्य काफी आकर्षक है! मन के दर्शन के लिए है पहाड़ी में कुल 981 ! सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती है पहाड़ी का क्षेत्र फल भाग 280 एकड और सड़क मार्ग से माँ खल्लारी मंदिर की दुरी लगभाग 1672 फिट लंबी है! खल्लारी का कुल क्षेत्रफल लगभाग 20 हजार 137 एकड में फेल हुआ है ! यहाँ अब करोडों की लगत से खल्लारी मातेश्वरी पहाड़ों में माता के दर्शन के लिए पहाड़ी तक पहुंचने के लिए डोंगरगढ़ की तर्ज पर यहां भी रोप-वे(उड़नखटोला/सिप्त) सुरु हो गई है !
बेमचा से हुआ है माँ खलारी का आगमन
खल्लारी मातेश्वरी का आगमन महासमुंद के निकट ग्राम बेमचा (खल्लारी ) से हुआ है! मन खल्लारि बुवति (पड़ोसी) का रुप धरण कर विशाल समाप्तहिक बजार भ्रमन कर खिलाड़ी से होते हुए 2 किलोमीटर दूर गुंजन पहाड़ी निवासी अपनी बहन खोरपा से मिलने जाती थी ! एक दिन बजारा राजा के मन मे खल्लारी माता का मनमोहक रूप कौध ग्या और राजा हट द्वारा पैने की चेष्टा करने लगा! बंजारा राजा माता खल्लारी के प्रेम में वंशीभुत होकर बाजार वापसी के समय उनका पिचा करने लग गया! इस पर माता ने अनेक बार राजा (बंजारा) को समझाया कि तू जिसे साधरण नारी समझ कर पिचा कर रहा है, वाह तेरी भूल है! जबकी मैं तुम्हारे गांव बेमचा की कुलदेवी खल्लारी माता हूं! पर बंजारा राजा सौन्दर्य प्रति इतना आसक्त हो गया था धर्म-अधर्म नीति-अदिति का कुछ भी ध्यान नहीं रहा और कामांध बंजारा राजा ने पिचा करना नहीं छोड़ा! तब कुपिट होकर नारी स्वरूप माँ खलारी ने बंजारा राजा को चेतवनी दी कि वह उसका पिचा करना छोड़ दे और कह दे कि यदि बंजारा तू खलारी के पहाड़ तक आया तो पत्थर में परिवर्तन हो जाएगा! फिर भी बंजारा राजा ने पिचा नहीं छोड़ा अंतत:माता के श्राप के कारण पथ में परिवर्तन हो गया! उक्त घाटना के बाद खल्लारी माता, खलारी के विशालतम पहाड़ी में समा गाई और उस स्थान पर खल्लारी माता ने अपने हाथ की उंगली को पहचान स्वरूप पहाड़ पर रहाणे दिया ! बाद खल्लारी माता के स्वप्ना देने प्रति उसकी उंगली के स्थान पर उश का उस विशालमत पहाड़ में ग्रामीणों के सहयोग से माता का मंदिर बनवाया गया! तब मंदिर का स्वरूप काफी छोटा था! हाँ, यह बीते कुछ साल पहले पहाड़ी पर करोडो की लगत से खलारी मातेश्वरी का भव्य मंदिर का निर्माण करवाया गया!
मूर्ति स्थापना के लिए स्वप्न में दीया था आदेस
ग्राम खल्लारी में प्रवेश करने के लिए खलारी माता का एक और मंदिर है उक्त मंदिर के संबंध में बताया जाता है की वहा के एक माल गुजारा को पहाड़ा वाली खल्लारी माता के स्वप्न में आदेश दिया कि मेरी फेंकी गई कटार (त्रिशूल) जहां भी गिरे वही पर मूर्ति स्थापित की जाए, क्योंकि वृद्ध और कामजोर भक्त पहाड़ चढ़ नहीं पाएंगे! अत; उन्ही इस स्थान है( मंदिर) पर भी उतना पूर्ण मिलेगा ,जितना पहाड़ पर मंदिर आने पर मिलता है! बाद उस स्थान पर भी मंदिर का निर्माण करवाया गया! उक्त स्थान आज माता राऊत के नाम से प्रसिद्ध है! वर्तमान मे इन दिनों करोडो की लगत से इस स्थान पर भव्य मंदिर का निर्माण कराया जा रहा है जहां नवरात्रि के दोनों पर्व में पूरे धार्मिक विधि- विधान के साथ पूजा याचना होती है ! खल्लारी मातेश्वरी पहाड़ में नौ दिवासिया प्रसाद स्वरूप अनवरत भोजन भंडार का भी भव्य आयोजन होता है! खल्लारी में नवरात्रि के दौरन श्रद्धालूओं को भारी भीड रहती है यहाँ प्रति वर्ष चैत्र पूर्णिमा मेला श्रद्धालूओं का आकर्षण केंद्र रहता है
भगवान श्री जगन्नाथ सहित काई दर्शनीय मंदिर
खल्लारी में प्राप्त शिला लेख के आधार पर सन 1414 ई. मुख्य निर्मित भगवान जगन्नाथ स्वामी का मंदिर इतिहास की सृष्टि से काफी महत्तवपूर्ण है! ईस मंदिर का निर्माण छहमासी रात्रि में किया गया है साथ हो खलारी के एक खेत में प्राचीन मंडपनुमा खंडहर है, इसके अलावा खल्लारी में आज भी प्रमुख-प्रमुख स्थान पर पत्थर से निर्मित पुरातन मूर्तियाँ, मन्दिर आदि पुरातावित अवशेष है,जो खल्लारी की प्राचीनता का प्रमाण है! यहां प्रमुख रूप से दर्शनिया भव्य महाकाली माता मंदिर में ,श्री गणेश मंदिर, शंकर- पार्वती मंदिर, हनुमान मंदिर ,श्री राधा कृष्ण मंदिर, श्री राम जानकी मंदिर,लक्ष्मी नारायण मंदिर है खल्लारी मातेश्वरी को पहाड़ी में श्री गणेश मंदिर, अन्नपूर्णा देवी माता का मंदिर बजरंगबली, भैरव बाबा ,शंकर भगवान, भागीरथी, सुरंग में दंतेश्वरी माता, शेर गुफा, भीम पाव चूल्हा, हाथी पत्थर, सिद्ध बाबा, विशाल डोंगा पाथर, श्री राम सीता,लक्ष्मण और केवट की मूर्ति, बंजारा पत्थर आदी है
द्वापर युग में पडवो ने बताया था
खल्लारी के इतिहास में अगर हम द्वापर युग पर नज़र डालें पाडव इस आँचल से गुजरे व अपना कुछ समय खल्लारी में बिताया! भीम ने अपना जोड़ी अपना पैर चट्टान पर पूरी शक्ति से साथ दबाया ,जहान जहान पैर पर बलदिया गया वहां-वहां उनका पैर चट्टान में धंस गया! इस दृश्य को देखकर हिडीमबनी प्रसन्न हो गई और माता खल्लारी के समक्ष गंधर्व विवाह कर लिया! आज भी पहाड़ी में भीम से संबंध अनेक चिन्ह देखने को मिलते हैं वही गांव के एक खेत में लचागृह का अवेश है।
यहाँ हर मनोकामना होती है पूरी
खल्लारी मातेश्वरी मंदिर से धार्मिक मान्यता भी जूडी हुई है कि यहां संतान प्राप्ति की मन्नत पूरी जरूर होती है नि: संतान दम्पत्ति आस्था वी श्रद्धा के साथ संतान प्राप्ति की मनोकामना लेकर पहुंचती है चैत्र पूर्णिमा मेला क्षेत्र के लिए किसी बड़े पर्व से कम नहीं है जहां पहाड़ा वाली मां खल्लारी अपने भक्तों की मनोकामना को पूरा करती है वर्शाते मांगी मन्नत सच्चे मन से हो
