ऐ! जिंदगी क्या लिखूं तुझ पर? गमगीन हृदयगत इन भावों से पावन कर दें मन का हर कोना स्पर्श कर सकूं हर रूह को।
विषय-स्पर्श कर सकूं रूह को ————————————— कुविचार को तजकर सारे चिंतन की कोई नई रीत दें समर्पित होकर उकेर सकूं दुख तकलीफ़ व जन की पीड़ा। शब्दों में मायूसी कभी न भरना खोखली रिवाजों में न समेटना अंतर्मन के हर द्वंद निकलें चुनिंदा कुछ एहसास हमें देना। कोरी ही रह जाएं न कल्पना खुशियों की…
