सरेआम बेटी लहूलुहान होती हैं।
कविता सिर्फ़ सुनी सड़को पर ही नहीं भीड़ में भी तो दरिंदगी होती हैं, मानवता अब मर चुकी हैं शायद सरेआम बेटी लहू लुहान होती हैं। चिख कराह दर्द सुनते नहीं कोई देखकर दृश्य आत्मा रो उठी हैं, महफूज़ नहीं कहीं कोई कली बेरहमी से वो क्यूं रौंदी जाती हैं? कानून के हाथ लंबे होते…
