सुरेन्द्र मिनोचा
मनेंद्रगढ़/एमसीबी :- प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण एमसीबी जिले का मुख्यालय मनेन्द्रगढ़ के पूर्व दिशा में नदी हसदो गंगा तट का पावन जल हिलोरें देता है, वहीं पश्चिम दिशा में कैमूर पहाड़ियों की टूटी हुई सुनहली लंबी श्रृंखला फैली हुई है,जो बिहारपुर से आगे सुनहली गांव से शुरू होकर आगे दूर तक अलग-अलग नाम से विभक्त होकर चिरमिरी की कोयला खदानों और आगे अंबिकापुर तक निकल जाती है।कहीं-कहीं पर यह सतपुड़ा की पहाड़ियों से भी मिलती है।वहीं उत्तर दिशा में राष्ट्रीय राजमार्ग 43 कटनी – गुमला मार्ग की सर्पिल आकार की सड़कों के किनारे श्वेत हिमाचली चंदन का वन समूह है, इसी नगर के दक्षिण दिशा में स्थित सिद्ध बाबा पहाड़ पर भोले बाबा का केदारनाथ स्वरूप में निर्मित मंदिर है जहां भोले बाबा उन्नत ललाट तेजस्वी रुप में विराजमान है।

यही मंदिर मनेन्द्रगढ़ की रक्षा एवं विकास के लिए हमेशा आशीर्वाद की मुद्रा में अपना संरक्षण एवं आशीर्वाद प्रदान कर रहा है, जो यहां की नागरिकों की आस्था का पवित्र केंद्र है।मनेन्द्रगढ़ के विद्वान ज्योतिषी एवं विचारक स्वर्गीय संत शरण त्रिपाठी जिन्हें हम शास्त्री जी के नाम से जानते हैं, मनेंद्रगढ़ के विकास की चर्चा में हमेशा यही कहा करते थे कि यह मनेन्द्रगढ़ “सिंह राशि” का शहर है और सिंह प्रवृत्ति होने के कारण यह कभी घास नहीं खाएगा, “अर्थात झुक कर नहीं रहेगा”, लेकिन अपने शौर्य और ताकत के बल पर जब विकसित होगा तब कई शहरो को पीछे छोड़ देगा। आज बदलती हुई परिस्थितियों में उनकी वाणी अक्षरशःसत्य साबित हो रही है।

मनेन्द्रगढ़ मुख्यालय के आसपास के जंगलों पहाड़ों और नदियों के सौंदर्य की चर्चा में हसदो नदी के जलप्रपात इसके उद्गम और बहाव के तट पर फैली चंदन वन के सौंदर्य की चर्चा जगजाहिर है।इसके साथ-साथ इसकी सहायक नदियों में हँसिया नदी का भी अपना अहम योगदान है।यही हँसिया नदी अपने सहायक छोटे-छोटे नदी नालों से जुड़कर उन्हें गलबहियां डालकर आगे बढ़ती है और मनेंद्रगढ़ में बस स्टैंड के नीचे काली मंदिर के पास विशाल बोरा का जल लेकर आगे बढ़ती हुई हसदो नदी में समा जाती है।हसदो एवं हँसिया नदी के इसी संगम स्थल पर गोंडवाना मरीन फॉसिल्स के अवशेष का पाया जाना ऐसा प्रतीत होता है कि समुद्री सीप को ढूंढने के लिए ही हँसिया नदी यहां आई थी।यह भी हो सकता है कि करोड़ों वर्ष पहले समुद्र की लहरों के साथ मिलकर यही हँसिया नदी मोतियों भरे सीप की बड़ी बड़ी खेप यहां लाकर उड़ेलने का कार्य कर रही थी जो कालांतर में पृथ्वी के रचनात्मक बदलाव में आज छोटी हँसिया की जलधारा बनकर रह गई है।विशेष बात यह है कि वैज्ञानिकों के मतानुसार समुद्री सीपों की उपस्थिति हँसिया – हसदो के संगम से लेकर मनेन्द्रगढ़- चिरमिरी रेलवे ब्रिज के नीचे लगभग 01 किलोमीटर तक फैली हुई है।यही वैज्ञानिक शोध हसदो एवं हँसिया नदी के संगम को महत्वपूर्ण बनाती है।

यही हँसिया नदी अपने स्थल से निकलकर धीरे-धीरे कई गांव की प्यास बुझाती पहाड़ों से घिरे चट्टानों से लगभग 50 फुट की ऊंचाई से जहां गिरती है ,वह स्थान कर्मघोंघा जलप्रपात कहलाता है,तब इसका सौंदर्य देखकर “वाह बहुत सुंदर” कंठ से निकल पड़ता है।आवागमन एवं इस जलधारा के लिए बने रास्ते के अलावा तीन तरफ से सुनहरी पहाड़ी से घिरा कर्मघोंघा जलप्रपात अपना अद्भुत सौंदर्य प्रस्तुत करता है।साल्ही गांव से मुड़ने के साथ ही कर्मघोंघा का सौंदर्य उसके जलधारा और पहाड़ी के किनारे किनारे बहने की सुंदरता से ही दिखाई पड़ने लगता है।जैसे-जैसे आप कर्मघोंघा के नजदीक पहुंचते जाते हैं, आपकी जिज्ञासा इसे और नजदीक जाकर देखने को होती है।बुजुर्गों से प्राप्त जानकारी के अनुसार यह स्थान पहले पहुंच विहीन होने के कारण लोगों का आना-जाना बहुत कम होता था।ज्यादातर पर्यटक यात्री बौरीडांड स्टेशन से उतरकर पहाड़ी रास्ते से पगडंडियों के सहारे चलकर यहां पहुंचते थे,कभी-कभी बौरीडांड स्टेशन से उतरकर पैदल आने वाले कई पर्यटक रात्रि में जंगल भटक गए थे और सुबह होने पर ग्रामीणों की जंगली पगडंडी के रास्ते के सहारे धीरे-धीरे स्टेशन तक पहुंच पाए थे और तब जान में जान आई थी।छ.ग. के पूर्व विधायक गुलाब कमरों के सहयोग से इस कर्मघोंघा तक पहुंचने हेतु पक्की कांक्रीट की सड़क छत्तीसगढ़ शासन द्वारा अब बनवा दी गई है, जिससे आसपास के गांव के लोग अपने परिवार और बच्चों के साथ यहां अब पहुंच रहे हैं।शिवरात्रि के दिन शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्र के लोगों का यहां पहुंचना एक भव्य मेले का स्वरूप हमें दिखाई पड़ता है। गाँव वाले इसे शिवरात्रि का मेला कहते हैं,मेला वह स्थल है जहां लोग आपस में एक दूसरे से मिलते हैं,दूसरे गाँव से आए रिश्तेदारों से मुलाकात हो जाती है,बच्चों को खिलौने मिलते हैं, गांव के लोग इस मेले में अपनी ग्रामीण व्यंजन गुलगुला, मुर्रा के लड्डू और बेसन के शक्कर पाग के साथ बनी लक्ठो जैसी चीजें भी बेच लेते हैं।यहां मौसम के परिवर्तन के अनुसार गांव की चीजे जिसमें चार, चिरौंजी, तेंदू एवं कोसभ जैसी चीज भी समय के अनुसार मिल जाती है।मेले का आकर्षण इन सब चीजों से और बढ़ जाता है,जो शहरी एवं महानगरी जीवन को नया ग्रामीण परिवेश उपलब्ध कराती है,जो हमें शांति और सुकून का एहसास कराती है।यहां बरसात के मौसम में चारों तरफ घिरी पहाड़ियों से गिरती जलधारा पुणे और मुंबई के बीच खंडाला एवं उससे जुड़े हुए पर्यटन स्थलों की छटा बिखेरती है।

पर्यटन के शौकीन श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या एवं प्रकृति को आध्यात्मिक आस्था से जोड़ने के प्रयास ने यहां एक भोले शंकर के मंदिर की स्थापना के विचार को बल दिया और शिवलिंग की स्थापना के साथ ही कटनी निवासी स्वर्गीय कैलाश नारायण श्रीवास्तव की आस्था ने यहां 8 मार्च 1986 में कठिन परिश्रम एवं जन सहयोग से लगभग 10 वर्षों में एक भव्य मंदिर का निर्माण करने में सफलता पाई।इन पहाड़ियों की ढलान को समतल कर बनाए गए सड़क एवं दूसरी ओर बहती हँसिया नदी के जल का बहाव यहां तक पहुंचने में विपरीत परिस्थितियों का एहसास कराती है, किंतु वर्तमान सड़क निर्माण जो साल्ही गांव के नीचे एक किलोमीटर उतरते हुए ढलान में जाने पर आप कर्मघोंघा धाम तक पहुंच जाते हैं।कर्मघोंघा नाम के बारे में कुछ विशेष जानकारी अब तक नहीं मिल पाई लेकिन घोंघा नाम के अनुरूप बनी घुमावदार पहाड़ियों का मिलन और बाहर निकलने हेतु केवल एक मार्ग की बनावट इसके शाब्दिक अर्थ को चरितार्थ करते हुए अर्थ देने की कोशिश जरूर करती है।आपने घोंघा की शक्ल जरूर देखी होगी और यह घोंघा बिल्कुल वैसा ही एक द्वार के साथ अपनी सभी ऊंची नीची पहाड़ियों नुमा खोल से घिरा हुआ होता है जैसा कर्मघोंघा का स्थल घिरा हुआ है।

साल्ही गांव के बारे में आप जो सोच रहे हैं वह बिल्कुल सही है,यह वही गांव है जहां छत्तीसगढ़ की पहली विधानसभा भरतपुर के पूर्व विधायक गुलाब कमरों का मूल निवास स्थान है,कर्मघोंघा धाम जाते समय साल्ही गांव के मुख्य मार्ग से उनका निवास लगभग 100 मीटर अंदर है। कर्मघोंघा तक पहुंचने के बाद इस पहुंच मार्ग के लिए पर्यटक उन्हें एक बार अवश्य याद करते हैं।यह सच है कि विकास के कार्य हमेशा राज्य शासन की स्वीकृति से होते हैं किंतु किसी स्थल विशेष के विकास का विचार उसकी उपयोगिता और नागरिकों की अपेक्षाओं को शासन तक पहुंचाने एवं स्वीकृत कराकर मूर्त रूप देने के लिए व्यक्ति विशेष को याद किया जाता है और कर्मघोंघा के लिए भी इसीलिए गुलाब कमरों याद किए जाएंगे।गुलाब कमरों को इसी तरह अपनी आस्था के रूप मनेन्द्रगढ़ के दक्षिण में बने सिद्ध बाबा मंदिर निर्माण की शुरुआत एवं विकास की नींव रखने का श्रेय भी प्राप्त है। यहां के लोगों की मान्यता के अनुसार इस नगर के दक्षिण में स्थित सिद्ध बाबा पहाड़ और उसमें विराजमान भोले बाबा के आशीर्वाद से ही इस नगर का विकास हो रहा है,इसी मान्यता की आस्था पूर्व विधायक गुलाब कमरों की भी रही है,यही कारण है कि मनेन्द्रगढ़ के संभ्रांत नागरिकों द्वारा सिद्ध बाबा के जीर्णोंधार तथा मंदिर तक पहुंच मार्ग के निर्माण के लिए दिए गए प्रस्ताव को उन्होंने तत्काल स्वीकार किया और स्वयं खड़े होकर इसका कार्य प्रारंभ करवाया।आज मनेन्द्रगढ़ नगर के सिद्ध बाबा पहाड़ के केदारनाथ स्वरूप पर बने भोले शंकर के मंदिर और उसके आशीर्वाद से मनेन्द्रगढ़ मे विकास के कई पन्ने लिखे जा रहे हैं जो हम सब एक-एक कर पढ़ रहे हैं।इस मंदिर के निर्माण में मनेन्द्रगढ़ के मृदुभाषी समाजसेवी, सहयोगी, स्वर्गीय मनोज कक्कड़ का सहयोग यह नगर कभी नहीं भूल पाएगा।जिन्होंने मंदिर निर्माण में अपने संपूर्ण तन मन धन से लगे रहकर इस मंदिर को पूर्णता प्रदान की,उन्होंने इस तथ्य को साबित किया कि ऐसे सहयोगियों के बल पर ही किसी भी समाज और नगर का विकास आगे बढ़ता है।

कर्मघोंघा पर्यटन के लिए आप मनेन्द्रगढ़ से निकालकर पी डबलू डी तिराहे के राष्ट्रीय राजमार्ग 43 से आगे अंबिकापुर रोड में जब चलते हैं तब लगभग 3 किलोमीटर की दूरी चलने के बाद जिला मुख्यालय कलेक्ट्रेट ऑफिस से आगे महामाया कोल्ड स्टोरेज से पहले इमली गोलाई से पश्चिम दिशा में डोमनापारा गांव से आगे भलौर होते हुए साल्ही तक पहुंचा जा सकता है।इसी गांव के आगे कुछ दूरी चलने पर दिखाई पड़ता है एक माइलस्टोन पत्थर कर्मघोंघा दूरी 1 किलोमीटर।मुख्य सड़क से दक्षिण की ओर घूमती कंक्रीट की पक्की सड़क आफको कर्मघोंघा पहुंचा देती है,आप अपनी दो पहिया या चार पहिया वाहन से जा रहे हैं तब यह दूरी मनेन्द्रगढ़ से
11 किलोमीटर के लगभग आपको कर्मघोंघा धाम के भोले शंकर के मंदिर एवं 50 फीट ऊंचाई से गिरते हंसिया नदी के अप्रत्यक्ष सौंदर्य को देखने को प्राप्त होगी। प्रकृति की इस अकूत संपदा को बनाने में हजारों वर्ष लगे होंगे, लेकिन पर्यटन के साथ आने वाले हमारे जीवन को समाप्त करने के लिए तैयार खड़ी पानी की प्लास्टिक बोतल एवं सिंगल उपयोग प्लास्टिक का प्रयोग पन्नी इसे भावी पीढ़ी को देखने से वंचित कर देगा।यदि आप चाहते हैं कि हमारी भावी पीढ़ी भी इसे इसी स्वरूप में देख पाए, तब हम केवल इतना सोचकर कर्मघोंघा का सौंदर्य देखने चले कि कम से कम मेरा परिवार कोई भी प्लास्टिक या पन्नी का प्रयोग यहां नहीं करेगा।सच मानिए आने वाला हर परिवार यदि इतना सहयोग करना प्रारंभ कर दे तब यकीन मानिए हम अपनी आगामी पीढ़ी को भी इसे इसी स्वरूप में दे पाएंगे।उम्मीद है आप भी हमारे इस विचारों से सहमत होंगे और एक कदम और आगे चलकर भावी पीढ़ी के लिए इसकी विकास गाथा लिखेंगे………बस इतना ही-अगली बार फिर चलेंगे किसी नए पर्यटन के पड़ाव पर……
“लेखन एवं प्रस्तुति
बीरेंद्र कुमार श्रीवास्तव”
