विदेशी धन पर पोषित संस्थाएं:सतीश उपाध्याय।

सुरेन्द्र मिनोचा

मनेंद्रगढ़/एमसीबी :- देश की अधिकांश प्रभावी ,गैर सरकारी संगठन ( एनजीओ) विदेशी धन पर ही निर्भर है। ये एन जी ओ विदेशी पैसों से ही समाज सेवा करते हैं। प्राय: एनजीओ को इनकी सुविधा के लिए इन्हें दान स्वरूप ही विदेशी धन प्राप्त होता है। ब्रिटेन ,जर्मनी ,आस्ट्रेलिया फ्रांस, स्पेन आदि देश भारत में संचालित एनजीओ को दान देने में अग्रणीय है।

विदेशो से करोड़ों का चंदा एनजीओ को निरंतर मिल रहा है। सुप्रीम कोर्ट के एक हलफनामा के संदर्भ में बात करें तो किसी भी एनजीओ को विदेशों से धन प्राप्त करने का मौलिक एवं संवैधानिक अधिकार नहीं है ,फिर भी देश के अधिकांश गैर सरकारी संगठन विदेशी धन पर ही निर्भर हैं।

हाल ही में देश की लगभग 6 हजार संस्थाओं के पंजीयन को निरस्त कर दिया गया एवं इन्हें विदेशी धन( चंदा )लेने पर रोक लगा दी गई ।इस पर गैर सरकारी संगठन तिलमिला उठे जैसे उनकी ऑक्सीजन मास्क उतार ली गई हो।

विदेशी धन चाहे दान के रूप में ही क्यों न हो इससे विदेशी फंडिंग की सहज प्राप्ति के लिए फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट एफसीआरए के कानून का प्रावधान है।जो विदेशों से आ रहे पैसों को प्राप्त करने में सुगमता प्रदान करता है।किसी भी एनजीओ को एफसीआरए में रजिस्टर्ड होना जरूरी है।विदेशी धन या उपहार का मुखौटा पहनकर समाज सेवा करने वाली संस्थाओं को यह फंड न मिल सके इसके लिए 2017 में फॉरेन कंट्रीब्यूशन एक्ट में संशोधन भी किया गया। विदेशी फंड का दुरुपयोग रोकने के लिए यह प्रावधान भी लाया गया कि विदेशी फंड को किसी अन्य संस्था या व्यक्तिगत रूप से किसी व्यक्ति को हस्तांतरित नहीं किया जा सकता।साथ ही चैरिटी चलाने वाली संस्थाओं को एफसीआरए के तहत पंजीयन कराना अनिवार्य कर दिया गया ,इसके लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय की अनुमति लेने की शर्त रखी गई। इस संशोधित प्रावधान के दायरे में जो एनजीओ नहीं आए उनका पंजीयन भी रद्द कर दिया गया। गृह मंत्रालय से अनुमति न मिल पाने के कारण देश की 6 हजार संस्थाओं का पंजीकरण रद्द कर दिया गया था। वर्ष 2020 में लोकसभा में एफसीआरए संशोधन विधेयक भी लाया गया, जिसके तहत आधार नंबर को अनिवार्य कर दिया गया। यह भी अजीब विडंबना ही है कि सामाजिक एवं धार्मिक कार्यों को ही अपना उद्देश्य बताने वाली संस्थाओं पर गंभीर आरोप भी लगते रहे हैं। इस विदेशी धन को देश की एकता, अखंडता के लिए खतरा भी बताया गया।

ऐसी स्थिति में विदेशों से आ रहे फंड पर भी नजर रखी जानी , विभिन्न स्रोतों से जुटाए गए तथ्यों से यह बात प्रमाणित हुई है कि कई फर्जी एनजीओ देश में कार्यरत है ,जिनका समाज सेवा से कोई वास्ता नहीं है। जबकि कई संस्थाओं के द्वारा विदेशी धन का दुरुपयोग भी किया गया है ।उनके पास न कोई रणनीति है न कोई स्थायी कार्यालय । वे करोड़ों के विदेशी धन का भी दुरुपयोग भी कर रहे हैं। एक आंकड़े के अनुसार देश में लगभग 32हजार से अधिक पंजीकृत एनजीओ हैं जो समाज सेवा के कार्य का दावा कर रहे हैं ,इन एनजीओ के कार्यों का प्रशासनिक मूल्यांकन न होने से ऐसे एनजीओ कागजी खानापूर्ति कर अपने समाज सेवा के खोखले दावे ही करते रहते हैं ।

सरकार को अब सख्ती से कदम उठाते हुए ,कालेधन को सफेद करने ,धन का दुरुपयोग करने पर ऐसे एनजीओ का पंजीकरण रद्द कर देना चाहिए ।इसके लिए इंटेलिजेंस ब्यूरो को सक्रिय किया जाना उचित होगा, जो उनके कार्यों की वस्तुस्थिति सरकार के समक्ष रख सके ।केंद्रीय गृह मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक प्रति वर्ष 13 करोड़ से अधिक विदेशी धन एनजीओ को प्राप्त होता है। पिछले 4 वर्षों में लगभग 50करोड से अधिक जो विदेशी धन प्राप्त हुए उसमें 130 देशों का दान देने में सहयोग था । सवाल यह उठता है कि करोड़ों का चंदा पाने वाली एनजीओ के समाज सेवा एवं ईमानदारी की सूक्ष्मता से जांच क्यों नहीं की जाती?

केंद्र सरकार को इस तथ्य पर भी विचार करना चाहिए कि इस विदेशी धन से देश का माहौल कहीं अशांत तो नहीं हो रहा है।यदि सरकार को विदेशी धन के दुरुपयोग का प्रमाण मिले तो तत्काल ऐसे फर्जी एनजीओ पर पाबंदी लगा देनी चाहिए। कुछ वर्ष पहले एनजीओ की विश्वसनीयता की जांच परख जब शुरू की गई थी तो उस समय विदेशी फंड से पोषित एनजीओ में से 13 हजार से ज्यादा ने अपना खुद लाइसेंस रद्द करा लिया।अब पिछले 4 वर्षों में देश में आने वाले विदेशी फंड 40 फ़ीसदी कम हो गए हैं।

यह अच्छी बात है कि देश में सीधी फंडिंग पर भी रोक लगाई गई है । एनजीओ को भी यह निर्देश दिया गया है कि वे गृह मंत्रालय के विदेशी शाखा को अपनी स्पष्ट जानकारी देवें, इसके लिए फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट 2010 के तहत बैंकों को भी सशक्त बनाया गया है। इसमें दो मत नहीं की मुट्ठी में गिने जाने वाली कुछ संस्थाएं तो बेहतर और पारदर्शिता से काम कर रही है लेकिन इस संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि यदि विदेशी फंड पर पारदर्शिता नहीं बरती गई तो कहीं ये राष्ट्र की संप्रभुता के लिए चुनौती न बन जाए।