छत्तीसगढ़ पर्यटन मंत्रालय ,मनेंद्रगढ़ के मेरिन फॉसिल्स को विशेष पर्यटन क्षेत्र घोषित करें-उपाध्याय।

सुरेन्द्र मिनोचा
एमसीबी :- मनेंद्रगढ़ के हसदेव नदी के तट पर 28 करोड़ साल पुराने मेरीन फॉसिल्स पार्क , जियोलॉजिकल सर्वे आफ इंडिया की नेशनल जियोलॉजिकल मॉन्यूमेंट्स में उल्लेखित है।

“पूर्ववर्ती सरकार से भी संरक्षण की मांग”

पूर्ववर्ती सरकार के मुख्यमंत्री के रेडियो कार्यक्रम “लोकवाणी” में मनेंद्रगढ़ के वरिष्ठ पर्यावरण एवं पुरातत्वविद सतीश उपाध्याय ने इसके संरक्षण एवं संवर्धन के लिए, राज्य शासन का ध्यान आकृष्ट किया था।
मेरीन फॉसिल्स को मनेंद्रगढ़ की राष्ट्रीय पहचान से जोड़ते हुए श्री उपाध्याय ने इसके संबंध में विस्तृत जानकारी देते हुए बताया कि -राज्य सरकार के संज्ञान में लेने के पश्चात मेरीन फॉसिल्स पार्क की सुरक्षा हेतु निरंतर प्रयास किये जा रहे हैं। छत्तीसगढ़ राज्य में मेरीन फॉसिल्स मिलने का यह पहला मामला है जो 28 करोड़ वर्ष पुराना बताया जाता है।

“पूरे छत्तीसगढ़ में 24 स्थानों में है जैव विविधता पार्क”

उन्होंने कहा कि विभिन्न समाचार पत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार मनेद्रगढ़ में 5700 हेक्टेयर में जैव विविधता पार्क भी स्वीकृत किया गया है। पूर्ववर्ती सरकार के द्वारा यह घोषणा की गई थी कि पूरे छत्तीसगढ़ स्थल में 24 स्थलों में विविधता पार्क विकसित किए जाएंगे।
मेरीन फॉसिल्स के निर्माण की प्रक्रिया पर उन्होंने यह जानकारी दी कि -“करोड़ों वर्ष पूर्व चीन तथा तिब्बत के पत्थर के प्लेट में आपस में टकराव की वजह से जमीन में बड़ा बदलाव आया था’ दो प्लेटों के टकराने की वजह से हिमालय का निर्माण हुआ, साथ ही जमीन की सतह ऊपर उठ गई इस वजह से समुद्र विलुप्त हो गया और समुद्री जीवाश्म के अवशेष पत्थरों में दबे रह गए, जो फासिल्स के रूप में सामने आये हैं ,जो भूगर्भ वैज्ञानिकों के लिए शोध का विषय है।

“1954 में की गई खोज”

मनेंद्रगढ़ के मेरिन फॉसिल्स साइट को पहली बार 1954 में खोजा गया था जो 1 किलोमीटर क्षेत्र में समुद्री जीवन एवं वनस्पतियों के जीवाश्म से भरा हुआ था। पुरातत्ववेत्ता उपाध्याय का कहना है कि- संभव है जो जीवाश्म ,शोधकर्ताओं’एवं भू वैज्ञानिकों के सामने आए हैं वे “बाई बाल्व मोलस्का”, “यूरीडेस्मा,”,” एवीक्युलोपेक्टेन” आदि समुद्री जीवों के जीवाश्म हो सकते हैं।

“पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति का वैज्ञानिक प्रमाण”

ये फासिल्स,शोध के बंद अध्याय को प्रारंभ कर सकते हैं क्योंकि जीवाश्म के इसी अध्ययन से पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति का वैज्ञानिक पुख्ता प्रमाण मिल सकता है। श्री उपाध्याय ने मनेंद्रगढ़ के 28 करोड़ वर्ष पुराने मेरीन गोंडवाना फॉसिल्स को अंतर्राष्ट्रीय मानको के अनुसार विकसित एवं संरक्षित किए जाने की मांग की है।

“विश्व की अनमोल धरोहर”

उन्होंने इसे विश्व की अनमोल धरोहर बताते हुए कहा कि -“यह स्थल भारतीय एवं अंतर्राष्ट्रीय भूगर्भीय संस्थान के वैज्ञानिक तथ्यों द्वारा प्रमाणित है,जो ब्रह्मांड में पृथ्वी की उपस्थिति एवं जीवन निर्माण का भी जीवंत प्रमाण है।
उन्होंने कहा कि इस स्थल पर पर्यावरणीय निरंतर दबाव पड़ रहा है। हसदो नदी के तट पर बरसात में जल स्तर बढ़ जाता है , जिससे स्थल में कटाव भी निरंतर बढ़ रहा है ।कटाव होने के कारण मनेंद्रगढ़ के मेरिन फॉसिल्स के अवशेषों को नुकसान पहुंच रहा है।
मेरिन फॉसिल्स के संबंध में जुटाए गए प्रमाणित तत्थो के आधार पर उन्होंने कहा कि- यह 1954 में प्रकाश में आया था एवं ,1973 में तीसरी गोंडवाना सिंपोजियम कैनबरा ऑस्ट्रेलिया में आयोजित की गई थी, जिसमें मनेंद्रगढ़ में स्थित मेरीन फॉसिल्स के महत्वपूर्ण उपस्थिति पर भी केंद्रित चर्चा की गई थी ।1982 में भारतीय वैज्ञानिक सर्वेक्षण विभाग द्वारा राष्ट्रीय भूगर्भीय धरोहर घोषित किया गया था एवं उस समय यह वैश्विक स्तर पर भी चर्चा का केंद्र बना हुआ था।

“अमेरिका की प्रकाशित पुस्तक में गोंडवाना फॉसिल्स पार्क”

1995 में अमेरिका में प्रकाशित पुस्तक “-गोंडवाना मास्टर बेसिन आफ पेनिनसुलर इंडिया” में मनेंद्रगढ़ फॉसिल्स की जानकारी दी गई थी ,पुस्तक के लेखक जे.जे. बीयर्स है।
चौथी अंतरराष्ट्रीय गोंडवाना सीपोजियम (विशेष चर्चा) 1997 में कोलकाता में संपन्न हुई, जिसमें मेरीन फॉसिल्स पार्क पर भी महत्वपूर्ण चर्चा हुई थी।
2013 में शोध पत्र” साइंस एवं टेक्नोलॉजी जनरल “में मनेंद्रगढ़ मेरीन फॉसिल्स की चर्चा की गई थी।

“गैरी डी मिंक की पुस्तक में भी इसका उल्लेख”

इस फॉसिल्स के संबंध में जानकारी, लेखक गैरी डी .मिकं जी ,की पुस्तक-“गोडवाना सिक्स स्पेक्ट्रोग्र्गामी सेडिमेंटोलॉजी और पैलियोनटोलाजी-” में भी मिलता है। इसी प्रकार अनीश कुमार की पुस्तक -“फासिल्स एंड अस साइंस इंडियन जनरल आफ जियोलॉजी-” कोलकाता में भी मनेंद्रगढ़ के 28 करोड़ वर्ष पुराने मेरीन फॉसिल्स का उल्लेख किया गया है। इंटेक्स द्वारा मार्च 2016 में प्रकाशित पुस्तक -“हेरीटेज मॉन्यूमेंट्स आफ इंडिया-” में 26 स्थलों का उल्लेख है इसमें मनेंद्रगढ़ के इस फॉसिल्स की भी जानकारी बताई जाती है।
एक प्रश्न के उत्तर में है कि- मनेंद्रगढ़ में यह गोंडवाना मेरिन फॉसिल्स की उत्पत्ति कैसे हुई? उपाध्याय ने कहा कि -वैज्ञानिकों ने जो तथ्य दिए हैं उसके हिसाब से मनेंद्रगढ़ पहुंचने के पहले समुद्र का बंगाल की खाड़ी से पतली रेखा(टथिस)के रूप में, सुबनसिरी,खेलगांव, दुधिनाला ,राजहरा, डाल्टनगंज, मनेंद्रगढ़ से उमरिया होते हुए राजस्थान की ओर इसका प्रवाह था।
उन्होंने बताया कि भारत में अन्य सर्वेक्षण एवं भू- वैज्ञानिकों के सर्वेक्षण के मुताबिक भारत में चार जगह फॉसिल्स प्रमाणित रूप से पाए गए हैं उसमें खेमगांव सिक्किम, राजहरा झारखंड, सुबासरी अरुणाचल प्रदेश, दार्जिलिंग पश्चिम बंगाल हैं।
उपाध्याय ने बताया कि जैव विविधता अधिनियम 2002 की धारा 37 के प्रावधानों के अंतर्गत सर्वेक्षण दल गठन किया गया है जो समय-समय पर अपनी रिपोर्ट संबंधित विभाग को प्रेषित करता है।

“रखरखाव के लिए राशि का आवंटन”

उन्होंने बताया कि वित्तीय वर्ष 2012-13 में जैव विविधता संरक्षण योजना के अंतर्गत मेरिन फॉसिल्स पार्क में चैनलिंग फेंसिंग पहुंच मार्ग के निर्माण गेट एवं चौकीदार भवन के निर्माण के लिए 17 लाख से अधिक राशि स्वीकृत की गई थी, इसके बाद के वर्षों में भी मेरीन फॉसिल्स के रखरखाव के लिए पर्यावरण प्रदेश की आठ पर्यावरण परियोजना में भी यह सम्मिलित है। उपाध्याय ने मनेंद्रगढ़ फासिल्स को पर्यटन के तौर पर विकसित करने की मांग को दोहराते हुए केंद्रीय पर्यटन मंत्रालय से मांग किया है कि इसके संरक्षण के लिए पर्यावरण एवं पुरातत्व में रुचि रखने वालों की एक विकास समिति बनाया जाना चाहिए जिससे इस मैरिन फॉसिल्स का तेजी से विकास हो सके।

“पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करें”

उपाध्याय ने कहा कि इसे पर्यटन स्थल के रूप में विकसित कर टूरिस्ट सर्किट में शामिल करने से क्षेत्र के विकास की संभावनाएं बढ़ेगी एवं निश्चित ही भविष्य में पर्यटन की दृष्टि से मनेंद्रगढ़ प्रदेश का महत्वपूर्ण क्षेत्र कहलाएगा’ क्योंकि छत्तीसगढ़ प्रदेश में स्थित यह इकलौता फॉसिल्स पार्क है तथा इसे राष्ट्रीय भू वैज्ञानिक स्मारक का दर्जा भी प्राप्त है।