छत्तीसगढ़ प्रांत जाँजगीर के उभरते हुए कवि गौरव राठौर जी के पंद्रह मुक्तक-

1.

ज्ञान का अंबार दे हे माँ शारदे
ज्ञान हमें निसार दे हे माँ शारदे
अज्ञान का अँधेरा सदा मिटाना यहाँ
हमें ज्ञानी संसार दे हे माँ शारदे।।

2.

ज्ञानियों का ज्ञान ही वस्त्र होता है
जो अज्ञानी है सदा वही रोता है
खलता जो हमसे आगे बढ़ते यहाँ
यत्न से सपने वो भी सँजोता है।।

3.

जिंदगी यहाँ छोटा नहीं बहुत बड़ा है
मौत भी अब अचानक मार्ग पर खड़ा है
वन,झरने,वन्य पशु-पंछी लुप्त हो रहे
इन्हें मिटाने के लिए मानव अड़ा है।।

4.

दर्द में यहाँ मुस्काना बहुत है
सबको सही पथ बताना बहुत है
कल की चिंता क्यों करना दोस्त
सभी को मिलकर हँसाना बहुत है।।

5.

हमेशा सूरज-सा जलते रहो
दलदल में कमल सा पलते रहो
हुनर है सबसे आगे बढ़ने की
खुद जग मे नदी-सा बहते रहो।।

6.

खुद पाओ अपने मंजिल को
तोड़ना न कभी किसी दिल को
जग अधूरा लगता माँ बिना
रोक न पाया चक्षु से सलिल को।।

7.

दर्दों से भरा पूरा यह संसार
ईश्वर ही लगाते खुद हमें पार
रास्तों पर काँटे बहुत आते है
प्रसूनो जैसा खिलकर हो तैयार।।

8.

अब सूरज बन उजियारा कर यहाँ
खुद आकाश मे उड़ाने भर यहाँ
औकात क्या हममें देखे सपने
ऐसा कर कि सब झुकाये सर यहाँ।।

9.

दर्द इंसान को लायक बनाता है
फर्ज इंसान को मंजिल दिखाता है
जीत मानने वाला कभी न हारता
वही जग में कुछ करके बतलाता है।।

10.

अँधेरा अपने अंतस से मिटाओ
खुद का बुराई अपने से हटाओ
श्री राम सा आचरण रख सदा यहाँ
अपने अंदर खुद बार-बार लाओ।।

11.

मेहनत करके बनो महान
ज्ञानी बन सभी देना ज्ञान
मिटाना मन से अज्ञानता को
पढ़कर पाओ सदा सम्मान।।

12.

कभी भी भूखे लोगों को मर्ज नहीं होता
सत्य के पथ पर चलने पर कर्ज नहीं होता
जिनकी सरकार होती है उनकी सत्ता पर
कोई केश कहीं कभी भी दर्ज नहीं होता।।

13.

आँखों में सपने लिए दर-दर भटकता हूँ
साथ में धन नहीं इसलिए सबको खटकता हूँ
अपने दर्द की अंतर्कथा को खुद सहकर ही
अब वक्त के गहरे सन्नाटों में धधकता हूँ।।

14.

प्रीति से जीवन खुशनुमा पल लगता है
खिला जीवन जैसे माहौल दल-दल लगता है
बढ़ते कदम यहाँ जीवन में अब सेवा करते
मात-पिता का चरणामृत पवित्र जल लगता है।।

15.

बाबूजी आप नियम है अनुसासन है
बाबूजी आप भवन के प्रसाशन है
मुझे ज्ञान,संस्कार दे योग्य बनाया
बाबूजी आप खुद इक स्वच्छ आसन है।।

– गौरव राठौर
जाँजगीर छ.ग.