महंगाई डायन होगे–

महंगाई डायन होगे–
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महंगाई डायन होगे भारी,
सुनो ग सुनव नर नारी|
कइसन के होगे हे लाचारी,
सुनो ग सुनव नर नारी||

बाई किहिस जाना हो,
ते लाबे गुड़ अऊ तेल|
एकर बिना गृहस्थी के,
कइसे चलही रेल||
आनी बानी के पच्चर मारे,
रात दिन वो मोला|
मेंहा केहेव झटकुन दे,
पइसा अऊ झोला||
उत्ता धुर्रा चलाएंव मैं गाड़ी,,,,,

लकर धकर मेंहा भाई,
पहुँच गेंव ग हटरी|
कोचिया मन चिल्लावत रहे,
जइसन के जी भटरी||
वोतके बेरा खोले राहे,
साग भाजी के गठरी||
मोर हाथ ल धर के,
घुमत राहे नोनी चटरी||
सब मेर जावत हों आरी पारी–

झोला धर के घुमत राहे,
कतको झन खरीददार,
सवा सौ रुपया किलो होगे,
घोटराहा राहेर दार||
नोनी किहिस बाबू,
ये कुंदरू के मुख ल टार|
केंवची रमकलिया ल,
झटकुन ले निमार||
भाजी मन नंगत दिखे भारी–

कोचिया ल पूछेव के रुपिया,
किलो हे तोर पताल|
सौ रुपया किलो सुन के,
मोर होगे बुरा हाल||
करुवा करेला अस्सी रूपया,
वोकर बदलगे चाल|
लाल अऊ पालक भाजी के,
झन पूछ कुछु हाल||
डोड़का के मांग होगे भारी–

बीस रुपिया पाव होगे,
बिन गतर के ढेंस|
लेना हे त ले,नी ते,
अपन मुड़ी ल ठेंस||
हमर पहुँच ले बाहिर होगे,
बरबट्टी अऊ मुरई|
खेड़हा,मखना ल कोन काहे,
आगी लगे तोरई||
कड़हा भाटा के भाव भारी–

जगा- जगा पानी माढ़े,
हावय रद्दा बाट में|
महंगाई के मारे संगी,
आगी लग गे हाट में||
गरीब मन ह भूख मरे,
मंडल ह मरे ठाठ में||
ये महंगाई बैरी होगे,
चर्चा होवे घाट-घाट में||
महंगाई डायन होगे भारी–

का बतावंव मेहा संगी,
अपन दुख ल तोला|
खाली हाथ वापिस आगेंव,
हलावत जी झोला||
खाली हाथ देख के बाई,
बन गे बम के गोला|
मोर प्राण ल कइसे बचावंव,
सुमरों शंकर भोला||
वो हा रूप बनाए बिकरारी–

मेंहा केहेव बाई तेहा,
झन कर अब बवाल|
खुली-खुला होहि तेला,
चल जल्दी निकाल||
दार भात रान्ध ले,
रखिया बडी या कढी|
कइसनों करके ये बिपत म,
काम निकाले ल पड़ही||
सुनता म मजा आथे भारी–
रचनाकार:–श्रवण कुमार साहू, “प्रखर”
शिक्षक/साहित्यकार, राजिम, गरियाबंद, (छ.ग.)