
दांवा(आगी)ढिलागे—–
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देखव तो खेत खार म,फिर से दांवा ढिलागे |
कतेक जीव जंतु ह, इंहा होरा कस भूंजागे||
पैरा के संगे संग म,हरियर रुख-राई ह जरगे|
किसान के संगवारी,कतेक जीव जंतु ह मरगे||
चतुरा बन अपन हिस्सा के,सकेल डरेस दाना|
फेर दूसर जीव जंतु ल,काबर करदेस बेगाना||
वाह रे इंसान तेहा,अतेक स्वार्थी कैसे हो गेस|
पड़ोसी घर आगी लगा,तै सोसन भर सो गेस||
का ये धरती म सिरिफ,तोरेच ग अधिकार हे|
बाकी जीव-जंतु मन के,का जीना बेकार है||
स्वार्थी मनखे तोर मारे,कतको के घर ह जरगे|
साँप,डेरू,कीरा- मकोरा,देख न तोर सेती मरगे||
पैरा नी बाचिस गाय बर,चिटरा,मुसुवा बर दाना|
जिंयत रुख ठुड़गा होगे,चिरई कइसे गाही गाना|||
पैरा ल जला-जला के,तेहा हवा म करे परदूषण|
कोरोना कस बनही इहि ह,रावण अऊ खरदूषण||
धरती म आगी लगे हे, मनमाने तपत हे आगास|
तोर मारे सब देवता मन के,अब मन होगे हतास||
गांव के गोठान म संगवारी,जावव पैरा करो दान|
खेत म आगी लगा के,अन्न के झन कर अपमान||
सुनव,अब भी बेरा हे,मोर कहीना ल मान मितान|
उन्हारी पैदा कर,फसल चक्र अपनाओ किसान||
रचनाकार:- श्रवण कुमार साहू, “प्रखर”
शिक्षक/ साहित्यकार,राजिम, गरियाबंद (छ.ग.)
