
झन काटो रुख ल
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झन काटो रुख ल,भोगे ल पड़ही न दुख ल|
सब मनखे ल बतावव,रुख-राई के सुख ल||
मौहा ल काटबे त, पान-पतरी कहाँ ले पाबे|
लइका बर,कमरछठ देवता ल,कइसे मनाबे||
दोना पतरी बिन पूजा के,कइसे पाबे सुख ल-
पिकरी ल काटबे झन,तै छइंहा ल कहाँ पाबे|
तिहि बता दे लक्ष्मीनारायण ल कइसे मनाबे||
जिनगी भर भोगबे,तेहा शनि देव के दुख ल–
लीम ल काटबे त दातून,अऊ दवाई कइसे पाबे|
गाँव के शीतला दाई ल,का कहिके तेहा मनाबे||
बिन आक्सीजन के,भोगबे कोरोना कस दुख ल-
बर म रहीथे ब्रम्हदेव,त बेल म रहीथे भोले शंकर|
बिन देवी देवता के,तोर जिनगी हे फकत कंकर||
तैतीस कोटि देवता के रूप,माने जाथे रुख ल–
बेटा के बिहाव म,हुमन के लकड़ी कहाँ ले पाबे|
ममा दाई ह मरहि त,वोला कइसे करके जलाबे||
सबमें काम आथे,कतेक बतावंव रुख के सुख ल-
अपन घर अंगना म,तुलसी के पौधा ल लगावव|
गोंदा,गुलाब,जइसन,अपन जिनगी ल महकावव||
सेवा करो संतान मानके,फेर देख एकर सुख ल–
रचनाकार:-श्रवण कुमार साहू, “प्रखर”
शिक्षक/साहित्यकार, राजिम, छ.ग.
