माँ हूँ मैं l 

माँ हूँ मैं नित,अपना धर्म निभाती हूँ ।
ममता की खातिर ,
हर कर्म कर जाती हूँ ।

कोख की पीड़ा सहती मैं ,
तब धरती बन जाती हूँ।
अपना रक्त, साँसें देकर,
वजूद नया बनाती हूँ ।

अस्तित्व का कण-कण,
मैं उसके लिए लुटाती हूँ
माँ हूँ मैं————-

संग चलती हूँ सदा मैं,
उसके उठने गिरने पर।
ब्याकुल ही हो जाती हूँ,
उसके जरा सा रोने पर।

देकर ममता की बाँहें ,
झूला उसे झूलाती हूँ ।
माँ हूँ मैं———–

सुख-दुख का ख्याल नहीं होता,
जब लाल मेरा रोता है।
तड़प -तड़प जाती हूँ मैं ,
जब कष्ट उसे होता है।

उसकी एक पीड़ा पर,
हर खुशी कुर्बान कर जाती हूँ
माँ हूँ मैं————

अपनी तोतली आवाज में ,
जब माँ कह कर पुकारता है।
मत पूछो सीने में मेरे,
दूध कैसे लहराता है।

ममता की झर-झर निर्झरणी ,
छुपा आँचल में पिलाती हूँ।

माँ हूँ मैं ———-

कर्म -पथ की परिभाषा मैं ,
गोद में उसे सिखाती हूँ।
कुंदन उसे बनाने में ,
खुद को मैं तपाती हूँ ।

तब राम, कृष्ण और शिवाजी ,
जैसे उन्हें बनाती हूँ।

माँ हूँ मैं ———

विधी जब अपना कोई ,
नया खेल रचाता है।
तब देवकी का कृष्ण ,
आँचल में मेरे आता है।

बनकर तब ममता सिंधु,
मैं यशोदा बन जाती हूँ ।
माँ हूँ मैं ——–‘

बेटे मेरे जब फँस जाते हैं ,
दुराचरण के दलदल में।
व्यथित हृदय से छुपा लेती हूँ ,
अपने ममता के आँचल में।

पीकर उनके दुर्गुणों को,
मैं गंगाजल बन जाती हूँ।
माँ हूँ मैं ———-

यही दुवा करती हूँ सदा मैं ,
वो कृष्ण बनें वो राम बनें।
ना बन सके कोई बात नहीं ,
उनके सत्य पथ गामी बनें

यहीं दुवा जगत -जननी से
हर पल मैं मनाती हूँ ।
माँ हूँ मैं ———-

पहाड़ों का सीना चीर दे,
वही सपूत कहलाता है ।
माँ का आशीष सिर पर हो,
कंटक भी फूल बन जाता है।

सारे काँटे पथ के उसके,
मैं पलकों पर उठाती हूँ ।

माँ हूँ —

स्वरचित
सुधा शर्मा
राजिम-छत्तीसगढ