रविवारीय प्रेरक कहानी में आपका स्वागत है


सहृदय
अगसिया भोजन कर रही थी तभी एक साथ वर्षीय बच्ची गली (खोर) से दौड़ती हुई आई और दादी मां… दादी मां..
. कहती हुई अगसिया की गोद में बैठ गई ।अगसिया बच्ची को गोद में पाकर प्रफुल्लित हो थी और उस बच्ची को अपने हाथ से भोजन खिलाने लगी। कभी खुद खाती तो कभी बच्ची को खिलाती। कभी बच्ची अपने हाथ से अगसिया को खिलाती।
मैंने अगसिया से पूछा, “मांजी ! यह आप की पोती है?
” हां साहब जी! यह मेरी पोती है तभी तो यह मेरे साथ भोजन कर रही है। क्यों बेटी सही है ना!” अगसिया स्वाभिमान पूर्वक बोली,” बच्ची ने सिर हिलाकर अगसिया की बातों में हामी भर दी। दोनों के भोजन करने के पश्चात मैंने बच्ची को पास में बुलाकर कौतूहल वस पूछा, “बेटी, तुम्हारी दादी मां कहां है ? बच्ची अगसिया की ओर इशारा करते हुए कहा,”वे है ना!” तभी पास में बैठी हुई एक बहन बोली, “बच्ची की दादी मां पिछले वर्ष सतलोक सिधार चुकी है बच्ची जानती भी है कि मेरी दादी अब इस संसार से पलायन कर चुकी है ;पर बच्ची कभी नहीं कहती कि मेरी दादी मर चुकी है तब से यह बच्ची इस अगसिया धोबिन को अपनी दादी मानती है और अगसिया भी अपनी सगी पोती के समान इस बच्ची को प्यार देती है। यह दिन भर यहीं रहती है स्नान भोजन यहीं करती है और समय- समय से यहां रात में भी सो जाती है, कई बार तो यह बच्ची अपने मां- बाप की सुधि भी नहीं लेती है।”बच्ची को मैंने पास बुलाकर उनके सिर पर हाथ फेरते हुए उससे पूछा,” बेटी, तुम्हारा नाम क्या है?
“बाबा जी! मेरा नाम बबीता तिवारी है।”
भेदभाव से ऊपर उठी हुई बच्ची, उनके मां-बाप एवं अगसिया मां को मैं नमन करता हूं।
लेखक
दिनेंद्र दास
कबीर आश्रम करहीभदर
अध्यक्ष, मधुर साहित्य परिषद् तहसील इकाई बालोद, जिला- बालोद (छत्तीसगढ़)
पिन नंबर 491227
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