भोपाल-अवधेश पुरोहित।

भोपाल :- प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से लेकर प्रदेश के मुखिया शिवराज सिंह तक जल मिशन के माध्यम से जल पहुंचाने का ढिंढोरा पीट रहे हैं, लेकिन यह प्रधानमंत्री ही जानते हैं कि प्रदेश के आइएएस आफिसर जिन्हें लोकसभा में प्रधानमंत्री मोदी ने बाबू की संज्ञा दी थी? यही बाबू हमारे मध्यप्रदेश में अपना कमाल दिखा रहे हैं और मध्यप्रदेश की शिवराज सरकार की परम्परा के अनुसार हर सरकारी योजना की फर्जी आंकड़ों की रंगोली सजाकर उन्हें खुश करने में आईएस अधिकारी और मोदी के बाबू जो कमाल इस प्रदेश में दिखा रहे हैं, उसका जीता-जागता नमूना प्रदेश की कई सरकारी योजनाएं शामिल हैं उनमें से इन दिनों जल मिशन की कारीगरी काफी सुर्खियों में हैं, स्थिति यह है कि इन बाबुओं के अधीनस्थ विभागों के अधिकारी फर्जी आंकड़ों की रंगोली सजाकर प्रदेश के गांवों में रहने वाले निवासियों के घर तक नल से जल पहुंचाने का दावा करते हैं लेकिन आज भी प्रदेश में जल मिशन की स्थिति यह है कि इस प्रदेश का चाहे बैतूल जिला हो या बुंदेलखंड पानी की उपलब्धता पर्याप्त नहीं है जिसकी वजह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में बने अनेकों शौचालय पानी के अभाव में ताले लगे हुए हैं और ग्रामवासी आज भी लोटा लेकर सड़कों के किनारे शोच करते हुए नजर आते हैं? लेकिन इसके बाद भी प्रधानमंत्री से लेकर हमारे प्रदेश के मुखिया इन फर्जी आंकड़ों की रंगोली सजाकर योजनाओं की सफलता दिखाने की बदौलत आये दिन समारोहों में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान यह दावा करते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बदौलत आज प्रदेश के लोगों के घरों-घर नल से जल पहुंचाने का काम किया जा रहा है, जबकि वास्तविक स्थिति यह है कि बैतूल जिले के आमला सहित प्रदेश के तमाम ग्राम आज भी बूंद-बूंद पानी के लिये तरस रहे हैं हालांकि बैतूल जिले को यह सौभाग्य मिला था कि कमलनाथ सरकार में यहां के एक जनप्रतिनिधि सुखदेव पांसे को लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग का कार्य मिला था लेकिन वह अपने क्षेत्र की नल-जल समस्या का हल निकालने की बजाय अपने आपको सौभाग्यशाली मंत्री होने का दावा तो करते रहे लेकिन जिले के रहवासियों की कंठ की प्यास बुझाने में वह सफलता हासिल नहीं कर सके? यह स्थिति अकेले बैतूल जिले के आमला की नहीं है बल्कि पूरे प्रदेश में लोग मीलों दूर चलकर पानी की जुगत बनाने में लगे रहते हैं? इसके बाद भी जल मिशन के अंतर्गत जल समस्या का निराकरण करने वाले पीएचई विभाग के प्रमुख सचिव अपने विभाग की योजनाओं को लेकर बड़ी-बड़ी बाते करते हैं लेकिन उनके यह दावे जमीनी स्तर पर नजर नहीं आते और लोग आज भी दूर दराज के क्षेत्रों में पानी के लिये तरस रहे हैं। लेकिन जिले के कलेक्टरों को इसकी हकीकत मालूम है और वह आये दिन अपने जिले के पीएचई अधिकारियों पर नल-जल योजना को लेकर डांट पिलाते रहते हैं, ऐसी ही स्थिति पिछले दिनों उज्जैन जिले की मिली जहां जल मिशन के तहत ५०३ गांवों के लिये स्वीकृत योजना के लिए ११६ नल-जल योजना पूर्ण हो सकी, पिछले दिनों वहां के कलेक्टर कुमार पुरुषोत्तम ने जिलेभर में यह योजना पूर्ण न होने को लेकर पीएचई विभाग के अधिकारियों पर कार्यवाही करने की चेतावनी दी, लेकिन जमीनी स्तर पर यदि पीएचई विभाग के अधिकारियों की स्थिति का जायजा लें तो राजधानी से लेकर जिले के पीएचई अधिकारी समस्या लेकर जो ग्रामीण जाते हैं उनको मिलते ही नहीं हैं और वह बेचारे पीएचई विभाग के चक्कर लगाकर आखिरकार समस्याओं से जूझते नजर आते हैं? यह स्थिति मप्र के नल-जल मिशन की है? जबकि मप्र के दमोह के सांसद प्रहलाद पटेल कभी स्थिति से समझौता नहीं करते वह छत्तीसगढ़ में जाकर तो उस सरकार के द्वारा चलाई जा रही नल-जल योजना की असफलता को लेकर चिंतित नजर आते हैं लेकिन उसी नल-जल योजना के तहत मप्र के पीएचई विभाग द्वारा कागजों में रंगोली सजाकर अधिकारियों द्वारा देने पर क्यों चुप्पी साधे हुए हैं? यह भी सवाल उठता है कि पहले अपना घर तो ठीक कर लें? मध्यप्रदेश में पीएचई विभाग द्वारा आदिवासी बाहुल्य जिलों में जो योजना चलाई जा रही है उसके तहत स्कूलों और आंगनबाडिय़ों में जो नल-जल योजना शुरु की गई है उनमें पानी तक नहीं आ रहा है? वह स्वयं ही सोचें कि नलों में पानी नहीं आ रहा तो उन स्कूलों के शौचालयों की स्थिति क्या होगी? ऐसा एक नहीं प्रदेश के कई जिलों में नल-जल योजना के तहत पीएचई विभाग द्वारा स्कूलों व आंगनबाडिय़ों में लगाये हैण्डपंपों की स्थिति तो यह है कि वह भेरूबाबा की तरह खड़े हुए हैं लेकिन उसका पानी वहां के बच्चों को नसीब नहीं हो पा रहा है। प्रदेश के अलीराजपुर में पीएचई विभाग द्वारा कराये गये कार्यों को लेकर असंतोष व्याप्त है। इसके बाद भी विभाग के प्रमुख सचिव अपनी योजनाओं की तारीफ करते नहीं थकते और जब उनसे योजना की असफलता की बात करो तो उनका एक ही जवाब रहता है कि मैं अभी इस संबंध में आपसे बात नहीं कर पाऊंगा और मैं दूसरे काम में लगा हूँ? यही वजह है कि प्रमुख सचिव की इसी कार्यशैली की बदौलत प्रदेश के राजधानी सहित तमाम जिलों के अधिकारी मिलते ही नहीं हैं, उन्हें फोन लगाओ तो उन्हें फोन तक उठाने की फुर्सत नहीं है? ऐसी स्थिति में सवाल यह उठता है कि क्या अपनी कंठ की प्यास बुझाने के लिये एक-एक पानी की बूंद के लिये तरस रहे ग्रामीणों की स्थिति क्या होगी, इसका तो अंदाजा स्वयं ही लगाया जा सकता है? प्रदेश के तमाम लोगों का सीएम शिवराज सिंह से यह आग्रह है कि वह जल मिशन को लेकर जो पीएचई विभाग के अधिकारियों ने फर्जी आंकड़ों की रंगोली सजाकर प्रस्तुत की है उसकी जांच किसी निष्पक्ष एजेंसी से कराई जाए तो पता चल जाएगा कि जिन आदिवासियों के भरोसे सत्ता पाने के लिए लाख कोशिशें कर रहे हैं उन्हीं आदिवासियों को पीएचई विभाग के प्रमुख सचिव की कार्यशैली के चलते संपूर्ण विभाग का यह आलम है कि वह आदिवासी एक-एक बुंद पानी के लिए तरस रहे हैं, विभागीय अधिारियों की इस तरह की नीतियों के चलते भाजपा को आगामी विधानसभा चुनाव में इसका नतीजा भुगतना पड़ सकता है और भाजपा को २०१८ के विधानसभा चुनाव की तरह २०२३ में भी भाजपा को गच्चा खाने की स्थिति बन सकती है? अच्छा यह होगा कि पीएचई विभाग के प्रमुख सचिव से लेकर उन अधिकारियों पर जो विभाग में मौजूद ही नहीं होते उन्हें ठीक किया जाए? वैसे तो इन अधिकारियों की तमाम शिकायतें पूर्व में आ चुकी हैं तो वहीं यह अधिकारी यदि कोई सूचना के अधिकार के तहत इनके गोरखधंधों का खुलासा करने का प्रयास करता है तो वह उस पर दबाव बनाकर चुप कर दिया जाता है? ऐसे अधिकारी राजधानी भोपाल में भी मौजूद हैं जो प्रतिमाह विभाग द्वारा अवैध तरीके से कमाई गई राशि का उपयोग अपने कुकर्म को दबाने में खर्च कर देते हैं? जरा इन अधिकारियों की संपत्ति और उनके द्वारा किये गये कार्यों की जांच भी सीएम किसी निष्पक्ष एजेंसी से काम करवाये तो पीएचई विभाग के अधिकारियों की कार्यशैली का उन्हें आभास हो जायेगा? लोगों का तो यहां तक कहना है कि मुख्यमंत्री के द्वारा ऐसे अधिकारियों के खिलाफ कोई जांच कराने की पहल की तो लोगों को उम्मीद नहीं है क्योंकि मप्र में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के कार्यकाल में भाजपा के प्रसिद्ध नारा सबका, साथ सबका विकास की बुलंदियों के चलते जमकर फर्जी आंकड़ों की रंगोली सजाने का काम करके अधिकारी सरकारी खजाने को चूना लगाने में लगे हुए हैं? ऐसे अधिकारियों की बदौलत ही आज प्रदेश कर्ज के बोझ से दबा हुआ है और यह अधिकारी मस्ती छानने में लगे हुए हैं? इन अधिकारियों के द्वारा किये गये काम जमीनी स्तर पर नजर नहीं आ रहे हैं? यही वजह है कि कई सालों से चल रहे नल-जल योजना के तहत किये गये कार्यों को लेकर कभी कलेक्टर तो कभी आम जनता सवाल उठा रही है और लोग बूंद-बूंद पानी को तरस रहे हैं ?
