पूरे भारत में भष्मशाला सिर्फ राजिम में मिला था: अरूण शर्मा अचानक राजिम पहुॅंचे पुरातत्वविद पद्मश्री अरूण शर्मा से पत्रकारों ने की बातचीत

पूरे भारत में भष्मशाला सिर्फ राजिम में मिला था: अरूण शर्मा
अचानक राजिम पहुॅंचे पुरातत्वविद पद्मश्री अरूण शर्मा से पत्रकारों ने की बातचीत

राजिम। ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी के अवशेष राजिम में मौजूद है। सीताबाड़ी की खुदाई से यह स्पष्ट हो गया हैं कि वर्तमान में शहर की जितनी आबादी है उतनी ही जनसख्ंया उस समय भी थी। संयुक्त परिवार के रहन-सहन उभर कर सामने आए है। चीनी बौद्ध भिक्षु ह्वेनत्सांग ईसा पूर्व के बीच सिल्क रूट (रेशम मार्ग) भारत आया था। उन्होंने भष्मशाला का जिक्र किया जो राजिम में मौजूद हैं। भारत में आज तक यह कही नहीं मिला है। उक्त बातें माघी पुन्नी मेला के अवसर पर पहुंचे पद्मश्री पुरातत्वविद् अरूण कुमार शर्मा ने पत्रकारों चर्चा के दौरान कही। उन्होंने आगे बताया कि सोढूर, पैरी एवं महानदी संगम के किनारे पूरा शहर बसा था। जिसमें मिट्टी के चार दिवारीे थी लगातार पेड़ कटने के कारण बाढ़ से बह गया। राजीवलोचन मंदिर के परिसर में जगत्पाल की मूर्ति है। वह असल में महात्मा बुद्ध की मूर्ति है। सीता बाड़ी के मुख्य द्वार पर सरस्वती की तकरीबन ऊंची प्रतिमा मिली है। मिट्टी के बर्तन माला, चूड़ियाॅं, दीया, लैम्प, चूल्हा खुदाई से प्राप्त हुए हैं। राजिम बड़ा शहर माना जाता था जहां व्यापारी वर्ग के लोग अधिक रहते थे। आसपास क्षेत्र में खुशबूदार चावलं होता था जिसे हाथी में लादकर भोग बनाने के लिए जगन्नाथपुरी भेजा जाता था। छत्तीसगढ़ का जंगली क्षेत्र हाथी पालने का स्थान था। जिसे विदेशों में भी जहाज के माध्यम सप्लाई किया जाता था। श्री शर्मा ने आगे बताया कि राजीवलोचन मंदिर के बालकानी के पिल्लर सिरपुर से मंागाया गया था। चारों कोण में स्थित चारधाम वराह अवतार, वामन अवतार, बद्रीनाथ अवतार, नृसिंह अवतार के मंदिर का निर्माण राजीवलोचन मंदिर के समकालीन हैं।