सिलेंडर हुआ 1175 रुपया, छोटे वर्ग के लिए खाना पकाना मुश्किल।

रिपोर्टर संतोष सोनकर

राजिम :- सिलेंडर की कीमतों में लगातार वृद्धि होने से छोटे एवं मध्यम वर्ग के लोगों में अब रिफलिंग करा पाना मुश्किल हो गया है। नतीजा फिर से पुराने लकड़ी और कंडे युग की ओर बढ़ रहे हैं। बहुत से ऐसे उपभोक्ता है जिनके पास लकड़ी और कंडे की व्यवस्था नहीं है नतीजन मजबूरी में ही टंकी खरीदने की नौबत आ गई है। कई लोग तो इनके लिए उधार एक दूसरे से पैसा मांग कर रेफलिंग करा रहे हैं। क्योंकि खाना बनाना पहले पायदान पर है यदि घर में खाना नहीं बनेगा तो छोटे बच्चे एवं बड़े भी कमजोर हो जाएंगे। भोजन के अभाव में सब कुछ नष्ट हो जाएगा, गरीब आदमी मजदूरी करके रुपए लाते हैं उससे राशन की समान भरे या फिर रिफिलिंग कराएं। हर तरफ धर्मसंकट नजर आ रही है बढ़ती हुई महंगाई ने उनकी कमर तोड़ कर रख दी है। दाल की कीमत सैकड़ा पार हो गया है। गनीमत है सरकार चावल उपलब्ध करा रही है इससे बहुत राहत मिली है। इस संबंध में महिलाओं ने कहा कि कुछ ही साल पहले सरकार ने सिलेंडर खरीदने के लिए मुफ्त में देने की योजना बनाई। लेकिन अब हर महीने ₹1200 कहां से आए यह चिंता की स्थिति बनी हुई है। एक आदमी ने बताया कि वह प्रतिदिन प्राइवेट सेक्टर में काम करने के लिए जाता है सुबह से लेकर 1:30 से 2:00 तक काम करते हैं इसके एवज में मात्र डेढ़ सौ रुपया मजदूरी मिलता है इन पैसों से परिवार चला पाना मुश्किल हो गया है। साथ ही जेब खर्चा भी नहीं हो पा रहा है यह बड़ी विडंबना बनती जा रही है। घरेलू महिला भुनेश्वरी, राधा, भाग्यवती, पार्वती, लक्ष्मी, गुंजेश्वरी, शारदा ने बताया कि जब से समान के अलावा सिलेंडर के दामों में बढ़ोतरी हुई है तब से हमारे घर में चटपटा डिस नहीं बनते। मन मार कर रहना पड़ता है। बच्चे कई बार जीद करते रहते हैं और हम उनके मनपसंद के व्यंजन नहीं बना पाते। इसी तरह से सोनाली, दीप्ति, संतोषी ने बताया कि हमारे घर की स्थिति आर्थिक रूप से बहुत कमजोर है। यह अच्छी बात है कि सरकार कम से कम चावल तो दे रही है। यदि सिलेंडर टंकी के रेट कम हो जाए तो बार-बार परिवार के लोगों द्वारा सिलेंडर कम जलाने की बात कही जाती रही है वह बंद हो जाएगी और हम मनपसंद के भोजन बनाकर सबको खिलाएंगे। उल्लेखनीय है कि जबसे सिलेंडर की कीमत बढ़ी है तब से लेकर अब तक एक जानकारी के मुताबिक 70% उपभोक्ता घटते हुए नजर आ रहे हैं। शहरों में ही ज्यादा संख्या में सिलेंडर भरवाए जाते हैं गांव में तो इनकी संख्या तेजी के साथ घटी है। इसी तरह बढ़ती रही तो आने वाले समय में शहरों में भी इनकी संख्या में कमी आ सकती है। वैसे शहर में मात्र एक जगह इंडन गैस एजेंसी है। नयापारा राजिम के अलावा गांव में भी टंकी सप्लाई करते हैं इसी तरह से नदी के दूसरे पाट में स्थित नवापारा राजिम शहर में एचपी का एजेंसी है। इन दोनों एजेंसी से दोनों शहर के अलावा सैकड़ों गांव में सप्लाई होती है।

 

शादी ब्याह में सिलेंडर की खपत ज्यादा-शादी विवाह के सीजन में घर आए मेहमानों के लिए खाना बनाने हेतु सिलेंडर की खपत सबसे ज्यादा हो रही है इससे विवाह में होने वाले खर्च में तेजी के साथ बढ़ोतरी हो रही है। वर्तमान में अंचल के अनेक गांव में रामायण सम्मेलन एवं प्रतियोगिता चल रहे हैं जिसमें भी भंडारे की व्यवस्था रखी गई है और सिलेंडर से खाना बनाया जा रहा है तो कहीं पर लकड़ी एवं कंडे को लेकर भोजन बना रहे हैं। सिलेंडर की कीमतों ने आम आदमी को परेशान करके रख दिया है सबसे ज्यादा गरीब तबके के लोग जो आर्थिक दृष्टिकोण से कमजोर है उनके लिए सिलेंडर से खाना पकाना  सपना हो गया है। दूसरी ओर लकड़ी की कीमतों में भी बढ़ोतरी हो गई है कंड़े मिलते नहीं। आखिरकार खाना बनाने के लिए क्या किया जाए समझ से बाहर हो गया है। चौक पर खड़े कुछ लोगों ने बताया कि अब तो प्रतिदिन गाय अर्थात पशुओं की संख्या भी कम होती जा रही है ऐसे गोबर कहां से आए चिंता बनी हुई है।