कविता
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विषय-डोली और अर्थी
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सुन पिता की दुख भरी कहानी
हर आँखों में भर आईं पानी।
बड़े अरमानों से निकली डोली
सबकी अपनी भाषा और बोली।
ससुराल पहुँच हुई वह सयानी
रिश्तों की दुनिया में उलझी रहती
मायके में कभी कुछ न कहती
रोज-रोज बेवजह ताने सुनती।
मन ही मन हरदम रोते ही रहती
फर्ज से कभी भी न पीछे हटती
हर दर्द हँसकर सहन कर लेती
जख्मों की वह परवाह न करती।
सेवा और सत्कार में रहती बंधी
कुचली गई हर एहसासे उसकी
जी न पाई वह अपनी जिंदगी
टूटी, बिखरी और रहती रूठी।
प्यार की सदा रही वह भूखी
दहेज़ लाने की रोज मांग बढ़ी
लात -जूते और मार भी खाती
गुमसुम सी अब वह रहने लगी।
रहती वह अब बहुत ही डरी
पिता के कर्ज को भूल न पाती
कुछ मांगने की हिम्मत नही रही
कर ली हारकर उसने खुदकुशी।
चिट्ठी में ही मन की बातें लिखी
चढ़ गई मैं आज दहेज की बलि
बात याद रही मुझे अच्छी-भली
ससुराल से निकलेगी मेरी अर्थी।।
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प्रेषक,
कवयित्री
सरोज कंसारी
नवापारा राजिम
जिला-रायपुर(छ.ग.)
