चौगेल राशी केंद्र में आत्मसमर्पित माओवादियों ने डी आर जी कैसल को बांधी राख में कहा- अब बंदूक नहीं, खतरे से संवारेंगे भविष्य
कांकेर – कभी समुद्र में बंदूक के साथ-साथ रहने वाले हाथ आज भाईचारे और विश्वास के दर्शक से जुड़ गए। प्रतापपुर क्षेत्र के ग्राम चाउगेल (मुल्ला) स्थित द्रौपदी केंद्र में आज आत्मसमर्पित माओवादियों ने जिला रिजर्व गार्ड डी आर जी के अनुयायियों द्वारा गणतंत्र दिवस मनाया गया। यह दृश्य संघर्ष से शांति, हिंसा से बुनियादी और हथियार से भूख की ओर बढ़ते बदलाव की भावनात्मक तस्वीर बन गई। आत्मसमर्पित माओवादी शांति कावाची ने बताया कि वह पहली बार रक्षाबंधन का उत्सव मना रहे हैं। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री कौशल विकास प्रशिक्षण के माध्यम से उन्होंने राखी बनाने की विधियां और आज जेनी हाथों से तैयार की गई राखी जेलों की पट्टियों पर बांधना उनके लिए बेहद खालिस और भावनात्मक अनुभव है।उन्होंने कहा कि समर्पण के बाद अब ऐसा महसूस हो रहा है कि वे वास्तव में समाज के मुख्यधारा में लौट आए हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय के प्रतिनियुक्ति पर बोलते हुए कहा कि पदाधिकार नीति से प्रभावित होकर उन्होंने पद ग्रहण का निर्णय लिया। रेज़िस्टेंस केंद्रों में उन्हें साया, काष्ठ शिल्प कला और राखी निर्माण सहित विभिन्न कौशलों का प्रशिक्षण दिया जा रहा है, ताकि वे इन खतरों के माध्यम से सम्मानपूर्वक उद्यमिता में बने रहें और अपने परिवार के साथ समाज में सामान्य जीवन जी सकें। वहीं डी आर जी युवा टेकेश्वर हिचामी ने कहा कि पहले गाजियाबाद ऐसी जगह थी कि दोनों पक्ष बंदूक लेकर सामने आए थे। आज पुराने हाथ राखी के पवित्र तिरंगे से जुड़े हुए हैं। उन्होंने कहा, आज उनकी बांधी राखी हमारी कलाई पर है, जो भाई की लंबी उम्र और सुख-शांति की कामना का प्रतीक है। यह आपके अंदर एक अलग और भावुक अनुभव है। यह मित्रता केवल एक पर्व का उत्सव नहीं है, बल्कि बदलाव की उस कहानी का प्रतीक है, जिसमें कभी संघर्ष का हिस्सा रहे लोग आज विश्वास और भाईचारे के विभिन्न पहलुओं को स्वीकार कर रहे हैं। दृढ़ता और कौशल विकास के माध्यम से आत्मसमर्पित माओवादी अब अपने हाथों में हथियार की जगह खतरा लेकर नई जिंदगी की शुरुआत कर रहे हैं। कल तक सामने- सामने थे, आज एक-दूसरे की कलाई पर विश्वास का धागा है।बंदूक से राखी तक का यह सफर, शांति और बंदूक की नई कहानी लिखी जा रही है।
