सतत् देखभाल और पोषण प्रबंधन ने बदली तस्वीरः कुपोषण से जूझता अरुण हेमला बना स्वस्थ, अब सामान्य श्रेणी में शामिल

बीजापुर‘‘जहाँ चाह है, वहाँ राह है‘‘ महिला एवं बाल विकास विभाग की टीम ने इसे सच कर दिखाया। आंगनबाड़ी केंद्र कोटिया पारा, गंगालूर में समन्वित प्रयासों और सतत् निगरानी से ढाई साल के अरुण हेमला ने कुपोषण को मात देकर सामान्य श्रेणी में वापसी की है। यह कहानी सिर्फ एक बच्चे के स्वस्थ होने की नहीं, बल्कि सामुदायिक ताकत और विभागीय संकल्प की मिसाल है।

कब और कैसे शुरू हुई जंग- बालक अरुण हेमला, पिता मंगू हेमला एवं माता शर्मीला हेमला, का जन्म 21 दिसंबर 2023 को 2.500 किग्रा वजन के साथ हुआ। बार-बार बीमार पड़ने और घर पर ठीक से भोजन न करने के कारण उसका वजन नहीं बढ़ रहा था। अप्रैल 2025 में स्थिति गंभीर होने पर उसे पोषण पुनर्वास केंद्र ( NRC) बीजापुर में भर्ती कराया गया। भर्ती के समय वजन मात्र 8.600 किग्रा था – जो उसकी उम्र के हिसाब से काफी कम था।
‘‘टीमवर्क‘‘ बना इलाज की कुंजी-  NRC से डिस्चार्ज के बाद असली चुनौती शुरू हुई। पर्यवेक्षक श्रीमती उषा वर्मा के मार्गदर्शन में एक पूरी टीम अरुण के पीछे लग गई-
मुख्य भूमिका निभाने वाले योद्धाः – आंगनबाड़ी कार्यकर्ता श्रीमती मुमीता सोरी – रोज घर जाकर मॉनिटरिंग और परामर्श, सहायिका श्रीमती सोनिया माज्जी – केंद्र में प्रेम से खाना खिलाना, मितानिनः श्रीमती देवली वाचम – घर-घर स्वास्थ्य शिक्षा, एएनएमः श्रीमती शोभा किरण मिंज – नियमित स्वास्थ्य जांच
क्या रही सफलता की रणनीति- 1. समस्या की पहचानः टीम ने देखा कि अरुण घर पर अकेले खाना नहीं खाता था, पर आंगनबाड़ी में दोस्तों के साथ बैठकर पूरा खाना खा लेता था।
2. व्यवहार परिवर्तनः माता-पिता को समझाया गया कि बच्चे को रोज केंद्र लाएं। यहाँ देखा-देखी में अरुण ने खाना शुरू किया।
3. सतत् निगरानीः कार्यकर्ता मुमीता सोरी ने हर हफ्ते वजन लिया, गृह भेंट कर स्वच्छता और थाली में 4 रंग – अनाज, दाल, सब्जी, फल – शामिल करने की ट्रेनिंग दी।
4. पूरक पोषणः केंद्र में रोज गर्म पका भोजन, रेडी-टू-ईट दिए गए। मितानिन ने दस्त-निमोनिया से बचाव सिखाया।
नतीजा उम्मीद से बेहतर- सिर्फ 13 महीने की मेहनत रंग लाई। मई 2026 में अरुण का वजन 10.600 किग्रा हो गया है। अब वह उम्र के हिसाब से सामान्य श्रेणी में है। उसकी आंखों में चमक और चेहरे पर मुस्कान लौट आई है।
माँ शर्मीला हेमला कहती हैं- पहले बहुत डर लगता था। दीदी लोग रोज आती थीं, समझाती थीं। अब मेरा बेटा खुद मांगकर खाता है। आंगनबाड़ी वाले सब भगवान जैसे हैं।
पर्यवेक्षक उषा वर्मा का संदेश- अरुण की कहानी बताती है कि कुपोषण लाइलाज नहीं है। आंगनबाड़ी, स्वास्थ्य और मितानिन – तीनों मिल जाएं तो हर बच्चा स्वस्थ हो सकता है। बस परिवार का साथ चाहिए।
यह सफलता सिखाती है- एक बच्चे को कुपोषण से निकालना मतलब एक परिवार का भविष्य बचाना है। सामुदायिक सहभागिता + नियमित निगरानी + सही पोषण = स्वस्थ बचपन यह उपलब्धि पोषण अभियान और छत्तीसगढ़ कुपोषण मुक्त अभियान के तहत जिले में चल रहे कुपोषण मुक्त बीजापुर के संकल्प को और मजबूती देती है।